वरिष्ठ नाटककार, लेखिका और निर्देशक साईं परांजपे को इस वर्ष के विष्णुदास भावे गौरव पदक से सम्मानित किया जायेगा । रंगमंच के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित पुरस्कार 5 नवंबर को रंगभूमि दिवस पर नाट्य सम्मेलन के अध्यक्ष मोहन जोशी द्वारा प्रदान किया जाएगा। अखिल महाराष्ट्र नाट्य विद्या मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. शरद कराले ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि पुरस्कार में गौरव पदक, 30,000 रुपये नकद, एक स्मृति चिन्ह, एक शॉल और एक श्रीफल शामिल हैं। साईं परांजपे ने बाल रंगमंच, वयस्क नाटक, नाटक लेखन, निर्देशन और अनुवाद जैसे विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दिया है। उनकी पहली पुस्तक 'मूलंच मेवा' आठ वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। उनकी मां शकुंतला परांजपे और दादा रघुनाथ पुरूषोत्तम परांजपे के प्रोत्साहन ने उनकी कलात्मक यात्रा को दिशा दी।
बाल नाटकों से लेकर प्रौढ़ रंगमंच तक
परांजपे जी ने बच्चों के लिए नौ नाटक लिखे। इनमें ‘पक्षियों का कवि सम्मेलन’, ‘पत्तों की नगरी में’, ‘क्या खूब हुई मस्ती’, ‘जादू का शंख’ और ‘पूँछ का श्राप’ जैसे नाटक शामिल हैं। ‘क्या खूब हुई मस्ती’ और ‘पूँछ का श्राप’ इन पुस्तकों को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों के पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके बाल नाटक आज भी स्कूली स्तर पर मंचित किए जाते हैं।
‘नांदा सौख्यभरे’, ‘सख्खे शेजारी’, ‘जास्वंदी’, ‘सोयरीक’, ‘माझा खेळ मांडू दे’ और ‘मोगरा फुलला’ जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने प्रौढ़ रंगमंच पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनके नाटक ‘जास्वंदी’ को वर्ष 1978 में महाराष्ट्र सरकार का उत्कृष्ट नाट्य निर्माण पुरस्कार मिला। वहीं, ‘सोयरीक’ नाटक को भी उत्कृष्ट नाट्य निर्माण के लिए सम्मानित किया गया।
हिंदी रंगमंच पर तमाशा
महाराष्ट्र की लोककला ‘तमाशा’ को हिंदी रंगमंच तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य भी परांजपे ने किया। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने ‘एक तमाशा अच्छा खासा’ और ‘धिक् ताम’ जैसे तमाशा-प्रधान नाटकों का लेखन और निर्माण किया। अपने पति अरुण जोगळेकर के साथ उन्होंने ‘नाट्यद्वयी’ संस्था के माध्यम से नाट्य प्रस्तुतियों का निर्माण किया।
परांजपे ने कई अन्य भाषाओं के नाटकों का मराठी और हिंदी में अनुवाद भी किया। नोएल कॉवर्ड के ‘ब्लाइथ स्पिरिट’ का मराठी रूपांतरण ‘इडा पीडा टळो’ तथा नील साइमन के ‘द ऑड कपल’ का मराठी रूपांतरण ‘तुझी माझी जोडी जमली रे’ उनके उल्लेखनीय कार्यों में शामिल हैं। विजय तेंडुलकर के नाटक ‘गिधाडे’ के हिंदी रूपांतरण ‘गिद्ध’ का निर्देशन भी उन्होंने किया।
कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2006 में परांजपे को पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया। वर्ष 2025 में उन्हें ‘ज़ी नाट्य गौरव पुरस्कार’ प्रदान किया गया। अब विष्णुदास भावे गौरव पदक के माध्यम से उनके नाट्य क्षेत्र में दिए गए योगदान का सम्मान किया जाएगा।