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वाराणसी रामनगर की रामलीला 2024 : अयोध्या से जनकपुर पहुंची बारात, राम-सीता मिलन के अलौकिक पल के साक्षी बनने पहुंचे महादेव और माता पार्वती, देवताओं नें की पुष्प वर्षा…

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• रामनगर की रामलीला 2024 : अयोध्या से जनकपुर पहुंची बारात, राम-सीता मिलन के अलौकिक पल के साक्षी बनने पहुंचे महादेव और माता पार्वती, देवताओं नें की पुष्प वर्षा…

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वाराणसी : प्रभु श्रीराम के शिव धनुष भंग करनें के बाद जनकपुर के साथ ही अयोध्या में खुशियां छा गईं। अयोध्या से बारात जनकपुर पहुंची। चारों भाई दूल्हा बनकर जनकपुर पहुंचे तो लगा मानों देवलोक धरती पर उतर आया हो। राम-सीता के मिलन के अलौकिक पल का साक्षी बननें के लिए माता पार्वती संग महादेव डमरू बजाते हुए स्वयं पहुंचे। वहीं आनंद में डूबे देवताओं नें देवलोक से पुष्प वर्षा की। रामनगर की रामलीला के छठवें दिन राम-सीता विवाह के प्रसंग का मंचन किया गया।

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रामलीला में कुंवर अनंत नारायण नहीं पहुंचे। इसकी वजह से देर से रामलीला शुरू हुई। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में छठें दिन तो जनकपुर और अयोध्या दोनों पर खुशियों की बरसात हो रही थी। जनकपुर जहां सीता राम के विवाह की तैयारियों में मगन था तो अयोध्या बारात ले कर जनकपुर पहुंचनें की खुशी थी। बारात लेकर चलनें की जल्दी सबको थी। चारों भाई जब दूल्हा बनकर जनकपुर पहुंचे तो यूं लगा कि जैसे देवलोक धरती पर उतर आया हो। रामलीला के छठें दिन खुशी से सराबोर माहौल में श्रीराम विवाह का प्रसंग मंचित किया गया। राजा जनक के दूतों नें अयोध्या पहुंचकर राजा दशरथ को जनक जी का पत्र दिया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने गुरु वशिष्ठ, भरत और अपनी रानियों को जनक का पत्र पढ़कर सुनाया।

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पत्र में बरात लेकर आनें का निमंत्रण के साथ धनुष यज्ञ का वृतांत शामिल था। राजा दशरथ भरत को बारात की तैयारी करनें को कहते हैं। सभी बाराती बनकर श्री राम के विवाह के लिए चल पड़ते हैं। हाथी, घोड़े, रथ और गाजे-बाजे के साथ बारात जनकपुर पहुंचती है। राजा जनक बारात का आतिथ्य सत्कार करते हैं और जनवासे में ठहराते हैं। राम और लक्ष्मण भी वहां पहुंच जाते हैं। इसके बाद चारों भाई दूल्हा बनकर घोड़े पर सवार हो कर जनकपुर पहुंचते हैं। महिलाएं उनका परिछन करती हैं। ब्रह्मा जी लग्न पत्रिका नारदजी से जनक के पास भिजवाते हैं। विवाह का मुहूर्त होनें पर जनक अपने दूत को भेजकर राजा दशरथ को विवाह मंडप में बुलवाते हैं। गुरु वशिष्ट के साथ सभी विवाह मंडप में गए।

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यह देख देवता पुष्प वर्षा करते हैं। तभी वहां महादेव माता पार्वती के साथ नंदी पर सवार होकर डमरू बजाते हुए पहुंचे। चारों ओर हर-हर महादेव के उद्घोष से वातावरण शिवमय हो जाता है। भगवान शिव नें सीता-राम के विवाह को जगत के लिए कल्याणकारी बताया। देवता श्रीराम की जय जयकार करनें लगे। गुरु वशिष्ठ कन्या को विवाह मंडप में बुलानें के लिए कहते हैं। मंडप में सभी अपनें आसन पर बैठते हैं। उधर जनक की पत्नी सुनयना चांदी के कलश में श्रीराम का पांव धोकर पांच बार अपनें नेत्रों से लगाती हैं। सबसे पहले विधि विधान से श्रीराम सीता का विवाह होता है। वशिष्ठ की आज्ञा से मांडवी, उर्मिला एंव श्रुतकीर्ति, तीनों कुंवारियों को मंडप में बुलाया गया। उनका भरत, लक्ष्मण, शत्रुध्न के साथ विवाह हुआ। राजा जनक दशरथ से कहते हैं कि हम सब प्रकार से संतुष्ट हैं। सखियां दूल्हा- दुल्हन को कोहबर में ले जाती हैं। वहां राम की आरती उतारी जाती है। अंत में वर को जनवासे में भेज दिया जाता है।

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