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अररिया-किसी की जीत-हार से मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.- पप्पू यादव

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किसी की जीत-हार से मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

 

लेकिन, ये सच है कि अपने समय में दिल्ली में बिहारियों का सबसे बड़ा कोई मददगार रहा है, तो वह शख्स पप्पू यादव हैं. दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग के बलवंत राय मेहता लेन पर बड़ा बंगला मिला हुआ था. आज भी इसमें जेडीयू के 1 सांसद हैं, लेकिन कोई झांकने तक नहीं जा सकता. वजह, मदद की कोई उम्मीद नहीं.
लेकिन, तब उस बड़े बंगले में स्वयं पप्पू यादव नहीं रहते थे. बस, एक छोटा-सा हिस्सा खुद के लिए रखा था. बाकी, वह #सेवाश्रम था. 5-7 सौ मरीज रहते. इलाज कराने पटना से दिल्ली गए हुए. ये भी नहीं कि सिर्फ उनके क्षेत्र के. जिन्हें कोई ठौर नहीं मिलता, उन्हें ऑटो वाले भी पहुंचा देते. दिल्ली के अधिकतर ऑटो वालों को बिना बताए पप्पू यादव के बंगले का पता होता.
और जो वहां पहुंच गया,पप्पू यादव किसी को मना नहीं करते. खुले में ही सुबह से कुर्सी-मेज लगाए मिलते. जात और इलाका भी नहीं जानते. बीमारी के बारे में जरुर पूछते. फिर, इस डॉक्टर को फोन लगाओ, उस डॉक्टर को फोन लगाओ. रहना-सहना फ्री. इलाज में पैसा घटता, तो वे भी देते. रोज सुबह वैन आता, जो बीमार को अस्पताल ले जाता, फिर शाम को वापस ले आता.
कोई हफ्ता रहता, तो कोई महीना. कोई ब्रेन ट्यूमर का मरीज होता, तो कोई कैंसर का. पप्पू यादव को कोई परहेज नहीं. साथ में खाना भी खा लेते. भंडारा 24 घंटे चलता रहता. अब खर्च-बांटने को इतने पैसे कहां से आते, हमें नहीं पता. लेकिन, जनता का काम हो रहा होता. सेवाश्रम भर जाता, तो व्यवस्था कहीं और कराते.
डॉक्टर और अस्पताल का नाम तो पप्पू की जुबान पर रहता. प्रभाव कितना, बस इससे समझिए. 2019 में पप्पू लोक सभा का चुनाव हार गए. 2020 में मुझे किसी व्यक्ति को एम्स में भर्ती कराना था. मैंने भारत सरकार के एक मंत्री को कहा. घंटे भर के प्रयास के बाद वे ना बोल दिए. फिर, पता नहीं क्यों, हमने पप्पू यादव को फोन कर दिया. अगले 1 घंटे में मरीज एम्स में भर्ती हो गया. हारे हुए पप्पू ने ही कोरोना काल में भी #कोटा में फंसे हुए छात्रों को लाने के लिए अपने बूते बसें भिजवाई थी, बाकी तो घर में बंद थे. दिल्ली में बिहारी मजदूरों को फूड पैकेट्स बांट रहे थे.

रिपोर्टर अवेश आलम

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