जर्मनी में कुशल मानव संसाधन की बढ़ती आवश्यकता और भारतीय युवाओं के लिए उभरते वैश्विक अवसर
कैमूर/बिहार
सत्यार्थ न्यूज ब्यूरो चीफ, सत्यम कुमार उपाध्याय

कैमूर। कैमूर जिले के रहने वाले और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जर्मन भाषा पर शोध कर रहे शोधार्थी आलोक कुमार उपाध्याय ने बताया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में श्रम बाजार का स्वरूप तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है। विकसित देशों में जनसांख्यिकीय बदलाव, विशेषकर कम जन्म दर और वृद्ध होती आबादी, ने कुशल मानव संसाधन की गंभीर कमी को जन्म दिया है। इस संदर्भ में जर्मनी की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद जर्मनी आज संरचनात्मक श्रमिक संकट से जूझ रहा है। विभिन्न सरकारी और आर्थिक शोध संस्थानों के आकलन के अनुसार, जर्मनी को अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाए रखने के लिए प्रति वर्ष लगभग सात लाख कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों की आवश्यकता है। यह कमी केवल अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और संरचनात्मक प्रकृति की है। यह आवश्यकता स्वास्थ्य सेवाओं, नर्सिंग और केयर सेक्टर, इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, तकनीकी व्यवसायों, औद्योगिक उत्पादन, निर्माण, लॉजिस्टिक्स और होटल प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। जर्मनी की बड़ी आबादी सेवानिवृत्ति की आयु में प्रवेश कर रही है, जबकि घरेलू स्तर पर उतनी संख्या में प्रशिक्षित युवा उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में जर्मनी की अर्थव्यवस्था बाहरी देशों से कुशल श्रमिकों पर निर्भर होती जा रही है। वही दूसरी ओर, भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। जनसांख्यिकीय दृष्टि से यह स्थिति भारत को एक संभावित वैश्विक कार्यबल प्रदाता के रूप में स्थापित करती है। किंतु केवल युवा जनसंख्या होना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक है कि यह जनसंख्या कौशल, भाषा और अंतरराष्ट्रीय कार्य-संस्कृति से लैस हो। इसी संदर्भ में जर्मन भाषा का महत्व विशेष रूप से उभरकर सामने आता है। जर्मनी में रोजगार, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सामाजिक एकीकरण के लिए जर्मन भाषा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। अधिकांश नियोक्ता और संस्थान यह अपेक्षा करते हैं कि विदेशी कर्मी न्यूनतम A2 से B1 स्तर तक जर्मन भाषा में दक्ष हों। जर्मनी की व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली, जिसे Ausbildung के नाम से जाना जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श मॉडल मानी जाती है। यह प्रणाली सैद्धांतिक शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का संतुलित संयोजन प्रस्तुत करती है। Ausbildung के अंतर्गत प्रशिक्षु न केवल किसी विशिष्ट पेशे में प्रशिक्षण प्राप्त करता है, बल्कि प्रशिक्षण अवधि के दौरान उसे मासिक मानदेय भी दिया जाता है। इस कारण यह प्रणाली आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात स्थायी रोजगार की संभावना Ausbildung को और अधिक व्यावहारिक बनाती है। इस श्रमिक संकट को देखते हुए जर्मन सरकार ने हाल के वर्षों में अपनी आव्रजन और श्रम नीतियों में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। स्किल्ड इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों को सरल बनाया गया है, वीज़ा प्रक्रिया को तेज़ किया गया है और गैर-यूरोपीय देशों, विशेषकर भारत, से कुशल पेशेवरों को आकर्षित करने पर विशेष बल दिया गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि जर्मनी दीर्घकालिक रूप से भारतीय कार्यबल को अपनी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग मान रहा है। वही भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह उल्लेखनीय है कि अब राज्य स्तर पर भी इस वैश्विक अवसर को पहचानने की शुरुआत हो चुकी है। बिहार सरकार द्वारा हाल ही में युवाओं के लिए प्रारंभ की गई पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है। इस योजना के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में योग्यता रखने वाले युवाओं को चयनित कर उन्हें जर्मन भाषा का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, ताकि वे जर्मनी में Ausbildung अथवा रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकें। यह पहल केवल विदेश भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कौशल विकास, भाषा प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार से जुड़ाव की एक समग्र नीति को दर्शाती है। बता दें कि बिहार जैसे राज्य, जहाँ प्रतिभा और श्रम की कोई कमी नहीं है, किंतु अवसर सीमित रहे हैं, वहाँ इस प्रकार की योजनाएँ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती हैं। यदि इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन पारदर्शिता, गुणवत्ता और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ किया जाता है, तो यह न केवल युवाओं के जीवन में बदलाव ला सकता है, बल्कि राज्य और देश की अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक योगदान दे सकता है। वही समग्र रूप से देखा जाए तो जर्मनी की प्रति वर्ष लगभग सात लाख कुशल श्रमिकों की आवश्यकता और भारत की विशाल युवा आबादी के बीच एक स्वाभाविक पूरकता मौजूद है। इस पूरकता को साकार करने के लिए भाषा प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा, सरकारी सहयोग और जागरूकता की आवश्यकता है। जर्मन भाषा सीखना आज केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि वैश्विक रोज़गार की दिशा में एक ठोस निवेश बन चुका है। यदि भारतीय युवा समय रहते इस अवसर को समझें और स्वयं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करें, तो वे न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करेंगे, बल्कि भारत को वैश्विक श्रम बाजार में एक सशक्त और विश्वसनीय भागीदार के रूप में भी स्थापित करेंगे।


















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