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नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है: कुन्दन वर्मा

विश्व नृत्य दिवस पर विशेष
29 अप्रैल 2024

नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है: कुन्दन वर्मा


संवाददाता सहरसा बिहार सत्यार्थ न्यूज़

विश्व नृत्य दिवस के अवसर पर शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान के नाट्य प्रशिक्षक, अभिनेता सह निर्देशक कुंदन वर्मा से हुए साक्षात्कार में कहा कि नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, यह आत्म-अभिव्यक्ति, संस्कृति, परंपरा और भावनाओं को दर्शाने का एक माध्यम है। यह शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी कई नृत्य रूप ईश्वर की आराधना से जुड़े होते हैं।नृत्य की उत्पत्ति प्राचीन काल से मानी जाती है। भारतीय शास्त्रों में “नाट्य शास्त्र” (भरतमुनि द्वारा रचित) को नृत्य का सबसे पुराना ग्रंथ माना जाता है। इसमें भरत मुनि ने नृत्य को ‘नाट्य’ का एक अनिवार्य अंग बताया है। भारतीय संस्कृति में नृत्य की शुरुआत देवताओं से जोड़ी जाती है।त्रेतायुग में देवताओं की विनती पर ब्रह्माजी ने नृत्य वेद तैयार किया, तभी से नृत्य की उत्पत्ति संसार में मानी जाती है।
— जैसे कि शिव का तांडव और विष्णु की मोहिनी रूप।नृत्य एक सशक्त अभिव्यक्ति है जो पृथ्वी और आकाश से संवाद करती है। हमारी खुशी हमारे भय और हमारी आकांक्षाओं को व्यक्त करती है।
मैथिली संस्कृति में नृत्य का विशेष स्थान है। यहाँ पारंपरिक लोकनृत्य और आधुनिक नृत्य शैलियाँ दोनों ही प्रचलित हैं।
झिझिया नृत्य:- यह विशेष रूप से दुर्गा पूजा के अवसर पर महिलाएं करती हैं, जिसमें सिर पर घड़ा रखकर दीप जलाकर नृत्य होता है।
सामा-चकेवा नृत्य:- यह भाई-बहन के प्रेम पर आधारित एक लोक पर्व के दौरान किया जाने वाला नृत्य है।
जट-जटिन नृत्य:- यह पारंपरिक नाटकीय नृत्य है, जो पति-पत्नी के बीच के प्रेम, तकरार और सामाजिक जीवन को दर्शाता है। यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में किया जाता है, जहाँ महिला पात्र “जटिन” और पुरुष “जट” की भूमिका निभाते हैं।
विदापत नृत्य:- यह महाकवि विद्यापति के गीतों पर आधारित होता है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की झलक होती है।
आजकल मैथिली गीतों पर आधारित आधुनिक नृत्य भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जो मंचीय प्रदर्शन, सोशल मीडिया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देखे जाते हैं। इनमें पारंपरिक भाव-भंगिमाओं को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि विगत दो दशकों से कला, कलाकार, संस्कृति व साहित्य को समेटे कोशी की अग्रणी सांस्कृतिक संस्था शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान ने भी शास्त्रीय व लोक नृत्य को प्राथमिकता देकर उसे समृद्ध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया है।

कुन्दन वर्मा
अभिनेता सह निर्देशक

जिले के उभरते हुए युवा नर्तक शुभम कुमार अपनी शानदार प्रस्तुति और कला के प्रति समर्पण से शहर का नाम रोशन कर रहे हैं। बचपन से ही नृत्य के प्रति गहरा लगाव रखने वाले शुभम ने शास्त्रीय एवं लोक नृत्य की बारीकियां शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान, सहरसा से सीखी है।
हाल ही में कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा पटना में आयोजित ‘बिहार गौरव महोत्सव’ में शुभम ने अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया, जिसे दर्शकों और कला प्रेमियों ने खूब सराहा। अपनी सफलता पर बात करते हुए शुभम कहते हैं – नृत्य केवल शरीर का संचालन या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह आत्मा की अभिव्यक्ति है जो हमें आध्यात्मिकता से जोड़ती है।
शुभम ने अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के अवसर पर अपनी भावनाओं को इन पंक्तियों के माध्यम से साझा किया –
नृत्य सृजन है, नृत्य विधा है
नृत्य विनाशक है, नृत्य सुधा है
नृत्य है कण-कण हर पल में,
नृत्य है सबके जीवन में।।
(शुभम कुमार)

युवा नर्तकी सालवी शर्मा ने कहा ‘विश्व नृत्य दिवस’ के शुभ अवसर पर नृत्य के प्रति अपने समर्पण को साझा करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है।”नृत्य केवल शरीर की हलचल नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है।” आज विश्व नृत्य दिवस पर मैं अपनी सफलता और कला का श्रेय ‘शशि सरोजनि रंगमंच सेवा संस्थान’ को देना चाहती हूँ। बचपन की शुरुआती थिरकन से लेकर आज की परिपक्वता तक, इस संस्थान ने मेरा हाथ थामे रखा है।
यहाँ का वातावरण और सिखाने का तरीका इतना प्रभावशाली है कि आज भी मैं यहाँ एक विद्यार्थी के रूप में जुड़ी हुई हूँ। यह संस्थान उन सभी के लिए एक प्रेरणा है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर नृत्य में भविष्य बनाना चाहते हैं। बेहतर शिक्षण और सही दिशा के लिए यह वास्तव में एक सराहनीय संस्थान है।
(सालवी शर्मा)

अदिति प्रिया बताती है, मैं वर्तमान में कलावती उच्च विद्यालय, बनगांव, सहरसा में नृत्य शिक्षिका के पद पर पदस्थापित हूं। मेरे माता-पिता और गुरु के सहयोग से मैं आज यहां तक पहुंची हूं। जब मैं 12 वर्ष की थी तब से ही मैं शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान से जुड़ नृत्य की बारीकियों को सीखी।
लोगों को लगता था, नृत्य बस एक टाइम पास हैं इससे मैं अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर पाऊंगी लेकिन नृत्य ने ही मुझे पहचान दिया।
लोग नृत्य देखने या स्वयं नृत्य करने के आदि होते हैं, लेकिन वे नृत्य के बारे में बहुत कम ही जानते और सोचते हैं।
जब आप नृत्य करते हैं, तो आपका उद्देश्य किसी निश्चित स्थान पर पहुंचना नहीं होता हैं। बल्कि, आपका उद्देश्य हर कदम का आनंद और जीवन का सार हैं। नृत्य के माध्यम से हम उन भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता हैं।
(अदिति प्रिया)

हंसिका गुप्ता बताती है वर्तमान में पूर्वी चंपारण के रेशमा देवी प्रोजेक्ट कन्या +2 विद्यालय, रामगढ़वा में नृत्य शिक्षिका के पद पर कार्यरत हूँ। मैने 11वर्ष की उम्र से शशि सरोजिनी रंगमंच सेवा संस्थान से नृत्य की शिक्षा ली हैं।
नृत्य एक ऐसी भाषा है जो शब्दों के बिना भावनाओं को व्यक्त करती है। यह पैरों से सपने देखने और संगीत की लय पर जीवन को महसूस करने की कला है। नृत्य मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को जोडता है। नृत्य शरीर, मन और आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। यह हृदय गति को बढ़ाकर रक्त संचार में सुधार करता है।
(हंसिका गुप्ता)

शालिनी सिंह बताती है, मैं जब 12वर्ष की थी तबसे शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान से नृत्य की शिक्षा लेना प्रारंभ की थी।
नृत्य की उत्पत्ति प्राचीन काल से मानी जाती है। यह मानव सभ्यता के प्रारंभिक युग से ही अस्तित्व में है, जब लोग प्राकृतिक घटनाओं, देवी-देवताओं की आराधना और सामाजिक उत्सवों को मनाने के लिए नृत्य करते थे।
भारत में नृत्य की सबसे प्राचीन जानकारी “नाट्य शास्त्र” से मिलती है, जिसे भरतमुनि ने लगभग 2000 साल पहले लिखा था। इसमें नृत्य को देवी-देवताओं की देन बताया गया है — जैसे शिव का तांडव और पार्वती का लास्य।
इससे स्पष्ट है कि नृत्य एक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा के रूप में हजारों वर्षों से चला आ रहा है।
(शालिनी सिंह)

नीतू कुमारी बताती है, मुझे बचपन से ही नृत्य में काफी रुचि थी, मैं स्कूल, कॉलेज के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया करती थी, वर्तमान में मैं शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान से जुड़ के नृत्य और नाटक में अपनी प्रस्तुति दे पहचान बना रही हूं।
नृत्य शारीरिक हाव-भाव, मुद्राओं और लयबद्ध गति के माध्यम से भावनाओं, विचारों और कहानियों को व्यक्त करने की एक कला है। यह संगीत के साथ तालमेल बनाकर किया जाता है और यह संस्कृति, पूजा, मनोरंजन या सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम हो सकता है।
लोग कभी कभी मुझसे पूछते थे। कि मैं क्यों नृत्य करती हूं। मुझे ताना देते थे। मेरा जवाब बस इतना ही था। मेरा मुख्य उद्देश्य आनंद है। नृत्य ने मुझे जो खुशी दी है उसे मैं वास्तव में बया नहीं कर सकती। बस इसे महसूस किया जा सकता हैं।
(नीतू कुमारी)

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