नव वर्ष 2026 का संकल्प: ‘आध्यात्मिक पेरेंटिंग’ से गढ़ें बच्चों का स्वर्णिम भविष्य
श्रेणी: कला, धर्म और देशभक्ति
लेखिका: मोनिका गुप्ता

जैसे ही हम वर्ष 2026 की दहलीज पर कदम रख रहे हैं, चारों ओर उत्सव का माहौल है। लेकिन एक सजग माता-पिता के रूप में, क्या हमने सोचा है कि इस नए साल में हम अपने बच्चों को उपहारों के अलावा और क्या दे सकते हैं? आज के डिजिटल युग में जहाँ बचपन स्क्रीन में सिमट रहा है, वहाँ ‘ आध्यात्मिक पालन-पोषण’ (Spiritual Parenting ) और सर्वांगीण विकास का संकल्प लेना समय की सबसे बड़ी मांग है।
*स्वयं का सुधार: धर्म और संस्कार की ओर पहला कदम
बच्चे वह नहीं करते जो हम कहते हैं, बल्कि वह करते हैं जो हम करते हैं। इस साल माता-पिता के रूप में हमारा पहला संकल्प होना चाहिए— “स्वयं को बेहतर बनाना”।
* धर्म की सीख : यदि हम चाहते हैं कि बच्चे धर्म और संस्कृति का सम्मान करें, तो हमें स्वयं शास्त्रों का थोड़ा अध्ययन करना होगा। परिवार के साथ मिलकर आरती, पूजा या सत्संग की छोटी सी परंपरा शुरू करना बच्चों में गहरे संस्कार बोता है।
* सात्विक जीवन: जब माता-पिता स्वयं क्रोध पर नियंत्रण और वाणी में मधुरता लाएंगे, तो बच्चे स्वतः ही मानसिक रूप से शांत और अनुशासित बनेंगे।
सर्वांगीण विकास: शिक्षा से बढ़कर
शिक्षा का अर्थ केवल स्कूल की मार्कशीट नहीं है। एक बच्चे का पूर्ण विकास तभी होता है जब उसका शरीर, मन और आत्मा—तीनों संतुलित हों। 2026 के लिए बच्चों के विकास का खाका कुछ इस प्रकार होना चाहिए:
1. शारीरिक विकास (Physical Growth)
खेलकूद केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुशासन और टीम वर्क सीखने की पाठशाला है। बच्चों को मैदान में पसीना बहाने दें। चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो या योग, शारीरिक श्रम से ही आत्मविश्वास बढ़ता है।
2. मानसिक मजबूती (Mental Fortitude)
गणित और तार्किक गतिविधियों से मस्तिष्क की धार तेज होती है। इस वर्ष बच्चों को स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ:
* एबाकस (Abacus ) और गणितीय गतिविधियाँ: जो एकाग्रता और गणना की शक्ति बढ़ाती हैं।
* शतरंज (Chess) और पहेलियाँ (Crossword puzzles): जो निर्णय लेने की क्षमता और धैर्य को विकसित करती हैं।
3. मन और आत्मा का जुड़ाव: कला और संस्कृति
केवल तार्किकता ही काफी नहीं है, बच्चे के भीतर संवेदनाओं का होना भी जरूरी है। कला (Art), संगीत और नृत्य आत्मा की भाषा हैं। यह बच्चे को तनाव से दूर रखते हैं और उनकी रचनात्मकता को पंख देते हैं। जब एक बच्चा तबला बजाता है या शास्त्रीय नृत्य सीखता है, तो वह अनजाने में अपनी संस्कृति और ‘धर्म’ के साथ गहरा जुड़ाव बना लेता है।
कला, धर्म और देशभक्ति का संगम
एक सच्चा नागरिक वही है जिसके हृदय में अपनी मिट्टी के लिए प्रेम हो। जब हम बच्चों को महान क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनाते हैं या उन्हें अपनी पारंपरिक कलाओं से जोड़ते हैं, तो उनके भीतर ‘देशभक्ति’ की भावना प्रबल होती है। धर्म हमें ‘सही’ और ‘गलत’ का भेद सिखाता है, और कला हमें अभिव्यक्ति देती है। इन तीनों का मिश्रण ही एक बच्चे को ‘पूर्ण मानव’ बनाता है।
निष्कर्ष: एक सामूहिक संकल्प
वर्ष 2026 केवल कैलेंडर बदलने का नाम नहीं, बल्कि सोच बदलने का अवसर है। आइए, एक संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को केवल ‘सफल’ होने के लिए नहीं, बल्कि ‘सार्थक’ जीवन जीने के लिए तैयार करेंगे। हम स्वयं भी धर्म का मार्ग अपनाएंगे और अपनी भावी पीढ़ी को भी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाएंगे।
यही सच्चा राष्ट्र निर्माण है। जब हर घर में संस्कारित और स्वस्थ बच्चे होंगे, तभी भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा।

















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