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प्पाश्चात्य संस्कृति के शोर में गूंजती सनातन संस्कृति की गौरवगाथा: ‘तुलसी पूजन दिवस

प्पाश्चात्य संस्कृति के शोर में गूंजती सनातन संस्कृति की गौरवगाथा: ‘तुलसी पूजन दिवस’

लेखिका: मोनिका गुप्ता

भारत की भूमि ऋषि-मुनियों और महान सांस्कृतिक विरासत की भूमि रही है। परंतु इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम पाते हैं कि ब्रिटिश शासन काल के दौरान अंग्रेजों ने भारत पर न केवल राजनीतिक रूप से राज किया, बल्कि अपनी संस्कृति और धर्म के प्रचार-प्रसार को भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बनाया। शिक्षा पद्धति से लेकर त्योहारों तक, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव इस कदर डाला गया कि धीरे-धीरे भारतीय समाज अपनी जड़ों से कटने लगा। आज के आधुनिक दौर में जब 25 दिसंबर का नाम आते ही बच्चों के मन में केवल ‘सांता क्लॉज’ और क्रिसमस की छवि उभरती है, ऐसे में ‘तुलसी पूजन दिवस’ का महत्व और भी बढ़ जाता है।

तुलसी: मात्र एक पौधा नहीं, साक्षात देवी
सनातन धर्म में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं माना गया है, बल्कि इसे ‘वृंदा’ यानी साक्षात देवी का स्वरूप माना गया है। आयुर्वेद में तुलसी को ‘संजीवनी’ की संज्ञा दी गई है, जो घर के वातावरण को शुद्ध करती है और असाध्य रोगों से लड़ने की शक्ति देती है। जब हम 25 दिसंबर को तुलसी पूजन मनाते हैं, तो हम केवल एक उत्सव नहीं मना रहे होते, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी को प्रकृति के प्रति सम्मान और अपनी औषधीय विरासत से परिचित करा रहे होते हैं।

संस्कारों की नींव:
आज की सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को पाश्चात्य चकाचौंध से बचाकर अपनी संस्कृति की ओर मोड़ने की है। इसी उद्देश्य को समर्पित है ‘सनातन संस्कार विद्या गुरुकुलम’। यह संस्थान बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि धर्म, कला और संस्कारों की वह शिक्षा दे रहा है जो उन्हें एक श्रेष्ठ नागरिक बनाती है। गुरुकुलम का प्रयास है कि बच्चे अपनी पहचान पर गर्व करना सीखें।

बच्चों को यह सिखाना अनिवार्य है कि उपहार देने वाला कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि उनके अपने संस्कार और माता-पिता के आशीर्वाद होते हैं। जब बच्चा हाथ में जल लेकर तुलसी को अर्घ्य देता है, तो वह धैर्य, श्रद्धा और संयम के संस्कार सीखता है।

समय की मांग: स्व-धर्म की ओर वापसी
अंग्रेजों ने अपनी परंपराओं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए भारतीय परंपराओं को अक्सर ‘अंधविश्वास’ का नाम दिया। लेकिन आज विज्ञान भी तुलसी के गुणों को स्वीकार कर रहा है। हमें यह समझना होगा कि यदि हमने आज अपने बच्चों को ‘तुलसी पूजन’ का महत्व नहीं समझाया, तो वे आने वाले समय में अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देंगे।

निष्कर्ष
25 दिसंबर का दिन हमारे लिए संकल्प का दिन है। आइए, अपने बच्चों को सिखाएं कि वे गर्व से ‘तुलसी पूजन’ करें, दीये जलाएं और अपनी सनातन संस्कृति का जयघोष करें। सनातन संस्कार विद्या

गुरुकुलम जैसे प्रयासों के माध्यम से ही हम फिर से भारत को सांस्कृतिक विश्वगुरु बना सकते हैं। इस वर्ष, आइए घर-घर में तुलसी की खुशबू फैलाएं और अपनी भावी पीढ़ी को संस्कारों का सबसे कीमती उपहार दें।

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