डिजीटल युग में ध्यान: बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की संजीवनी
ओशो दर्शन के अनुसार एक अनिवार्य जीवन शैली
लेखिका: मोनिका गुप्ता

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘ध्यान’ (Meditation) शब्द अक्सर सुना जाता है, लेकिन ओशो के दर्शन के अनुसार, ध्यान कोई क्रिया नहीं बल्कि ‘होने’ की एक अवस्था है। ओशो कहते थे कि ध्यान का अर्थ है—अपने भीतर के मौन से जुड़ना और स्वयं के साक्षी (Witness) बन जाना।
बच्चों के लिए ध्यान: जरूरत या अनिवार्यता?
अक्सर लोग सोचते हैं कि ध्यान बुढ़ापे की चीज है, लेकिन ओशो का मानना था कि बच्चों को ध्यान की सबसे ज्यादा जरूरत है। आज के बच्चे तकनीकी उपकरणों, सूचनाओं के बोझ और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में दबे हुए हैं।
एकाग्रता और सजगता: ध्यान बच्चों की चंचलता को दबाता नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देता है। इससे उनकी याददाश्त और सीखने की क्षमता बढ़ती है।
तनाव से मुक्ति: छोटी उम्र में ही बच्चे प्रदर्शन के दबाव में हैं। ध्यान उन्हें इस मानसिक बोझ से मुक्त कर उनके भीतर के आनंद को जीवित रखता है।

स्वयं की पहचान: ओशो के अनुसार, यदि बच्चा बचपन से ही सजग (Aware) है, तो वह समाज द्वारा थोपे गए ढांचों में फंसने के बजाय अपनी प्रतिभा को पहचान पाएगा।
माँ के लिए ध्यान की महत्ता
एक माँ केवल एक शरीर को जन्म नहीं देती, बल्कि एक चेतना को आकार देती है। ओशो दर्शन के अनुसार, यदि माँ अशांत है, तो उसका प्रभाव बच्चे के सूक्ष्म शरीर पर पड़ता है।
शांत पालन-पोषण: एक ध्यानपूर्ण माँ अपने बच्चे पर अपनी कुंठाएं नहीं थोपती। वह बच्चे को वह बनने की स्वतंत्रता देती है जो वह वास्तव में है।
भावनात्मक संतुलन: मातृत्व के चुनौतीपूर्ण सफर में ध्यान माँ को वह धैर्य और स्थिरता प्रदान करता है जिसकी उसे हर पल जरूरत होती है।
शादी और संतानोत्पत्ति से पहले ध्यान क्यों?
ओशो का एक क्रांतिकारी विचार यह था कि हर व्यक्ति को शादी करने और बच्चा पैदा करने से पहले ध्यान सीखना चाहिए। इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण हैं:
स्वयं को जानना: जब तक आप खुद को नहीं जानते, आप किसी दूसरे व्यक्ति (जीवनसाथी) के साथ न्यायपूर्ण संबंध नहीं बना सकते। ध्यान आपको प्रेम और मोह के बीच का अंतर समझाता है।

चेतन गर्भाधान (Conscious Conception): ओशो कहते थे कि यदि माता-पिता ध्यानपूर्ण और आनंदित अवस्था में संतान को जन्म देते हैं, तो वे एक उच्च कोटि की आत्मा को आकर्षित करते हैं। एक अचेतन और तनावपूर्ण मिलन से सामान्य चेतना ही जन्म लेती है।
शक्तिशाली और जागृत बच्चे (Awakened Kids): यदि माता-पिता ‘जागृत’ हैं, तो वे एक ‘शक्तिशाली और जागृत’ पीढ़ी तैयार कर सकते हैं। ऐसे बच्चे भविष्य में युद्ध, नफरत और संकीर्णता से मुक्त होकर एक नई दुनिया का निर्माण करेंगे।
निष्कर्ष
ध्यान केवल आँख बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि होशपूर्वक जीना है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से स्वस्थ, साहसी और बुद्धत्व की ओर बढ़ने वाली हो, तो हमें ‘ध्यान’ को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। एक ध्यानपूर्ण व्यक्ति ही एक बेहतर समाज और एक बेहतर विश्व की नींव रख सकता है।

















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