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कटनी का ट्रांसपोर्ट नगर: 42 साल बाद भी अधर में, व्यापारी हताश, जनता त्रस्त

कटनी का ट्रांसपोर्ट नगर: 42 साल बाद भी अधर में, व्यापारी हताश, जनता त्रस्त

कटनी, मध्य प्रदेश, 9 सितंबर 2025*: कटनी शहर के पुरैनी में प्रस्तावित ट्रांसपोर्ट नगर योजना, जो 1983-84 में शुरू हुई थी, आज 42 साल बाद भी अधूरी पड़ी है। शहर के यातायात जाम और अव्यवस्था को कम करने के लिए बनाई गई यह योजना, जो ट्रांसपोर्ट कारोबार को शहर के बाहर शिफ्ट करने का लक्ष्य लेकर चल रही थी, कागजों और वादों तक सीमित हो गई है। नगरीय प्रशासन विभाग और नगर निगम की सुस्ती, नियमों की अनदेखी, और दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी ने इस योजना को जटिलता के घेरे में उलझा दिया है। नतीजा? ट्रांसपोर्टरों का कारोबार चरमराया, और कटनी की जनता हर दिन जाम और अव्यवस्था का दंश झेल रही है। यह मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक नाकामी का प्रतीक बन चुका है।

### *योजना का उद्देश्य और शुरुआती प्रगति*
1983-84 में कटनी के पुरैनी क्षेत्र में 20 हेक्टेयर भूमि पर ट्रांसपोर्ट नगर की स्थापना के लिए योजना शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य शहर के घंटाघर, अग्रसेन पार्क और आसपास के इलाकों में फैले ट्रांसपोर्ट कारोबार को व्यवस्थित करना और यातायात को सुचारू बनाना था। 2010 में मध्य प्रदेश सरकार की मंत्री परिषद ने 266 ट्रांसपोर्टरों को भूखंड आवंटन की स्वीकृति दी। 158 रुपये प्रति वर्ग फीट की रियायती दर पर 114 भूखंड आवंटित किए गए। हालांकि, नियमों का पालन न करने और कारोबार शुरू न करने के कारण 19 ट्रांसपोर्टरों की लीज रद्द कर दी गई। वर्तमान में 95 कारोबारी भूखंडों के मालिक हैं, जिनमें से केवल 73 ने भवन निर्माण के लिए नक्शा पास कराया है। आश्चर्यजनक रूप से, मात्र 28 कारोबारी ही निर्माण कार्य को पूरा कर पाए हैं। शेष 22 व्यापारियों ने नक्शा पास कराने में रुचि ही नहीं दिखाई।

### *नगरीय प्रशासन का ताजा आदेश और विवाद*
3 सितंबर 2025 को नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने पत्र (क्रमांक यूडीएच/2/0281/2025/18-3) जारी कर नगर निगम को कड़े निर्देश दिए। विभाग ने स्पष्ट किया कि 2010 की स्वीकृत सूची से बाहर के 115 नए ट्रांसपोर्टरों को भूखंड आवंटन करना नियमों के खिलाफ है। नगर निगम ने 2018, 2019 और 2021 में इन भूखंडों के लिए पैरवी की थी, लेकिन विभाग ने इसे ठुकरा दिया। यह आदेश न केवल नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी हलचल मचा गया है। स्थानीय नेताओं और अधिकारियों के बीच इस आदेश को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।

### *ट्रांसपोर्टरों की व्यथा*
ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि भूखंड आवंटन की जटिल प्रक्रिया और देरी ने उनके कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई व्यापारियों ने भूखंड के लिए पैसे जमा किए, लेकिन निर्माण की अनिवार्य शर्त (आवंटन के एक साल में निर्माण पूरा करना) पूरी न होने पर उनकी लीज रद्द होने का खतरा मंडरा रहा है। आठ ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ एसडीएम कोर्ट में मामले दर्ज हैं, क्योंकि उन्होंने लीज रेंट जमा नहीं किया या निर्धारित पते पर कारोबार शुरू नहीं किया। एक स्थानीय ट्रांसपोर्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमने भूखंड का पैसा तो चुकाया, लेकिन सड़क, बिजली, और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं आज तक उपलब्ध नहीं हुईं। बिना सुविधाओं के निर्माण कैसे करें?” ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि नगर निगम ने न तो समय पर सुविधाएं प्रदान कीं और न ही प्रक्रिया को सरल बनाया।

### *जनता का दर्द*
कटनी का घंटाघर क्षेत्र आज भी मिनी ट्रांसपोर्ट हब के रूप में जूझ रहा है। लोडर वाहनों की बेतरतीब आवाजाही, लोडिंग-अनलोडिंग, और अव्यवस्थित पार्किंग से हर दिन जाम की स्थिति बनती है। अग्रसेन पार्क और रामलीला मैदान तक लोडर वाहनों का कब्जा हो गया है, जिससे स्थानीय निवासियों का जीना मुहाल हो गया है। एक निवासी शिखा जैन ने कहा, “हर दिन जाम में घंटों फंसना पड़ता है। यातायात पुलिस की मौजूदगी के बावजूद स्थिति बेकाबू है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को हमारी परेशानी का कोई ख्याल नहीं।” नागरिकों की शिकायतों के बावजूद कोई ठोस समाधान नजर नहीं आ रहा।

### *प्रशासन की लापरवाही*
पिछले 42 सालों में कटनी के कई महापौर और जनप्रतिनिधियों ने ट्रांसपोर्ट नगर को शिफ्ट करने के वादे किए, लेकिन कोई भी इसे धरातल पर नहीं ला सका। वर्तमान महापौर प्रीति संजीव सूरी ने भी अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में शिफ्टिंग का दावा किया था, लेकिन तीन साल बाद भी कोई प्रगति नजर नहीं आ रही। नगर निगम आयुक्त नीलेश दुबे का कहना है, “93 कारोबारी निर्माण कार्य शुरू कर चुके हैं, और शीघ्र ही शिफ्टिंग प्रक्रिया पूरी होगी।” हालांकि, यह दावा खोखला लगता है, क्योंकि 42 साल पुरानी योजना आज तक अधर में लटकी हुई है।

### *राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा*
यह 42 साल पुरानी योजना अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कटनी का यह मामला न केवल स्थानी शहरी नियोजन और प्रशासनिक सुस्ती का नमूना है, बल्कि देश के कई अन्य शहरों में भी ऐसी समस्याएं मौजूद हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल शर्मा ने कहा, “जब एक योजना को लागू करने में चार दशक लग जाएं, तो यह प्रशासन की नीयत और क्षमता दोनों पर सवाल खड़ा करता है।” यह मुद्दा अब स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय मंचों पर चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि यह जनता की परेशानी और व्यापारियों के नुकसान का प्रतीक बन चुका है।

### *क्या है समाधान?*
कटनी के ट्रांसपोर्ट नगर का मामला प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी, और जनता-व्यापारियों की अनसुनी आवाज का प्रतीक है। नगरीय विकास विभाग का ताजा आदेश उम्मीद की किरण जरूर जगाता है, लेकिन बिना दृढ़ इच्छाशक्ति और ठोस कार्रवाई के यह योजना कागजों में ही सिमटकर रह जाएगी। ट्रांसपोर्टरों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना, प्रक्रिया को सरल बनाना, और समयबद्ध शिफ्टिंग योजना लागू करना ही इस समस्या का हल है। सवाल यह है कि क्या कटनी का प्रशासन इस ऐतिहासिक नाकामी को सुधारने के लिए कदम उठाएगा, या यह योजना 50वें साल में भी अधर में लटकी रहेगी?

*हरिशंकर पाराशर प्रकाशन, कटनी*
नोट: यह समाचार सामान्य जानकारी के लिए है और कॉपीराइट एक्ट 1957 के तहत संरक्षित है। बिना अनुमति के पुनःप्रकाशन या उपयोग न करें।

*नोट*: यह समाचार हरिशंकर पाराशर प्रकाशन के लिए तैयार किया गया है और कॉपीराइट एक्ट के तहत संरक्षित है। इसमें दी गई जानकारी मूल स्रोत के आधार पर विस्तारित और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत की गई है, ताकि यह अखबार की भाषा में पाठकों के लिए रोचक और सूचनात्मक हो।

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