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बिचपुरा की बेटियों ने हर्बल गुलाल से बदली होली की तस्वीर

बिचपुरा की बेटियों ने हर्बल गुलाल से बदली होली की तस्वीर

केमिकल मुक्त रंगों से आत्मनिर्भर बनीं 9 ग्रामीण महिलाएं, हजारों की कमाई और पर्यावरण संरक्षण का संदेश कटनी (मध्य प्रदेश), विशेष संवाददाता — मध्य प्रदेश के कटनी जिले के बड़वारा विकासखंड अंतर्गत ग्राम बिचपुरा की महिलाओं ने होली के पारंपरिक रंगों को नया अर्थ दिया है। रासायनिक गुलाल की जगह प्राकृतिक सामग्री से बने हर्बल गुलाल बनाकर ये महिलाएं न केवल स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा कर रही हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हो रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत जीवन अमृत संकुल स्तरीय संगठन से जुड़े चार स्व सहायता समूहों—अभि, राघव, रागिनी और मानवी—की कुल 9 महिलाओं ने “होली के रंग आजीविका के संग” अभियान को सफल मिसाल बना दिया है। ये महिलाएं पहले घरेलू कामों और सीमित संसाधनों तक ही सीमित थीं। बाजार की जानकारी न होने और उत्पाद बेचने का अनुभव न होने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी। लेकिन जिला पंचायत के आजीविका मिशन के प्रशिक्षण कार्यक्रम ने इनके जीवन में क्रांति ला दी। प्रशिक्षण में हर्बल गुलाल बनाने की तकनीक, प्राकृतिक सामग्री का चयन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की पूरी जानकारी दी गई। प्राकृतिक सामग्री से बने सुरक्षित गुलाल महिलाएं पूरी तरह घरेलू और प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करती हैं: चुकंदर से लाल/गुलाबी रंग पालक से हरा रंग हल्दी और अन्य जड़ी-बूटियों से पीला/नारंगी रंग गुलाब के फूलों से प्राकृतिक खुशबू और सुगंध इन सामग्रियों को सुखाकर, पीसकर और सावधानीपूर्वक मिश्रित किया जाता है। कोई केमिकल, सिंथेटिक डाई या हानिकारक पदार्थ नहीं मिलाया जाता। परिणामस्वरूप बना गुलाल त्वचा, आंखों और सांस के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। बच्चे और बुजुर्ग बिना किसी चिंता के इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

बिक्री का सफर: घर-घर से सोशल मीडिया तक शुरुआत छोटे स्तर पर हुई। महिलाएं घर-घर जाकर गुलाल बेचती थीं। फिर स्थानीय हाट-बाजारों में स्टॉल लगाए। अब व्हाट्सएप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए ऑर्डर आने लगे हैं। होली के मौसम में एडवांस ऑर्डर मिल रहे हैं, जिससे हजारों रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। एक महिला सदस्य ने बताया, “पहले हम घर के खर्चों के लिए दूसरों पर निर्भर रहती थीं। अब खुद कमाई कर रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। बाजार में ग्राहकों से बात करना, कीमत तय करना—सब कुछ आत्मविश्वास से कर लेती हैं।”बहुआयामी लाभ स्वास्थ्य सुरक्षा: एलर्जी, जलन या सांस की समस्या से मुक्ति। पर्यावरण संरक्षण: केमिकल प्रदूषण कम।आर्थिक सशक्तिकरण: होली सीजन में अच्छी कमाई, परिवार पर निर्भरता कम। उद्यमिता का विकास: ग्रामीण महिलाओं में नवाचार और आत्मविश्वास की भावना जागृत। यह पहल न केवल महिलाओं को रोजगार दे रही है, बल्कि सुरक्षित होली मनाने का संदेश भी गांव-गांव पहुंचा रही है। बिचपुरा की ये 9 महिलाएं साबित कर रही हैं कि सही मार्गदर्शन और थोड़ा अवसर मिले तो ग्रामीण बेटियां भी बड़े बदलाव ला सकती हैं। हर्बल गुलाल अब महज रंग नहीं—यह स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण का मजबूत प्रतीक बन चुका है। बिचपुरा की बेटियां होली को रंगीन ही नहीं, सार्थक भी बना रही हैं।

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