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उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: BJD, BRS और SAD के बहिष्कार से NDA के पक्ष में मजबूत हुआ समीकरण, जीत के लिए अब 386 वोट पर्याप्त

उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: BJD, BRS और SAD के बहिष्कार से NDA के पक्ष में मजबूत हुआ समीकरण, जीत के लिए अब 386 वोट पर्याप्त

*लेखक: हरिशंकर पाराशर*

नई दिल्ली, 8 सितंबर 2025: भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए मंगलवार (9 सितंबर) को होने वाले चुनाव के समीकरण ने अंतिम क्षणों में नया मोड़ ले लिया है। जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे के बाद रिक्त हुए इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन और विपक्षी इंडिया गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुदर्शन रेड्डी के बीच कड़ा मुकाबला है। लेकिन ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD), तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और पंजाब के शिरोमणि अकाली दल (SAD) के चुनाव से दूरी बनाने के फैसले ने कुल वोटरों की संख्या को प्रभावित कर दिया है। इससे जीत का गणित बदल गया है और NDA को फायदा पहुंचा है।

चुनाव आयोग के अनुसार, मतदान संसद भवन के वासुधा भवन के कमरा नंबर F-101 में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक होगा। वोटों की गिनती शाम 6 बजे से शुरू हो जाएगी और परिणाम उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे। यह चुनाव गुप्त मतदान और एकल हस्तांतरणीय वोट प्रणाली से होगा, जिसमें प्रत्येक सांसद का वोट बराबर महत्व रखता है। यदि कोई उम्मीदवार बहुमत प्राप्त नहीं करता, तो कम वोट वाले उम्मीदवारों को हटाकर प्राथमिकताओं के आधार पर वोट स्थानांतरित किए जाएंगे।

चुनाव से दूरी का ऐलान: क्षेत्रीय दलों की रणनीति

चुनाव से महज एक दिन पहले तीन क्षेत्रीय दलों ने महत्वपूर्ण फैसला लिया। BJD के सांसदों ने पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के निर्देश पर मतदान बहिष्कार का ऐलान किया। पार्टी के सांसद सस्मित पात्रा ने कहा कि यह निर्णय वरिष्ठ नेताओं, राजनीतिक मामलों की समिति और सांसदों से परामर्श के बाद लिया गया है। BJD का कहना है कि वह NDA और इंडिया गठबंधन दोनों से समान दूरी बनाए रखने की नीति का पालन कर रही है। पार्टी का फोकस ओडिशा के 4.5 करोड़ लोगों के विकास और कल्याण पर है।

BRS के कार्यकारी अध्यक्ष के.टी. रामा राव (केटीआर) ने भी स्पष्ट किया कि पार्टी के सभी राज्यसभा सांसद वोट नहीं देंगे। यह फैसला पार्टी अध्यक्ष और पूर्व तेलंगाना मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की नेताओं के साथ बैठक में लिया गया। केटीआर ने कहा कि तेलंगाना में यूरिया की भारी कमी के कारण किसान आक्रोशित हैं। केंद्र की BJP सरकार और राज्य की कांग्रेस सरकार दोनों ही इस समस्या को नजरअंदाज कर रही हैं। कतारों में इंतजार के दौरान किसानों के बीच झड़पें हो रही हैं। यदि नोटा (None of the Above) का विकल्प होता, तो पार्टी उसी का इस्तेमाल करती। लेकिन चूंकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं, इसलिए बहिष्कार ही एकमात्र विकल्प है।

SAD ने पंजाब में बाढ़ की स्थिति का हवाला देकर चुनाव से दूरी बनाई। पार्टी के पास लोकसभा में एक सांसद है, जो अब वोट नहीं देगा। इन तीनों दलों के इस कदम से विपक्ष को झटका लगा है, जबकि BJP ने इसे अप्रत्यक्ष समर्थन बताया। केंद्रीय मंत्री जुअल ओरम ने कहा कि BJD का फैसला NDA उम्मीदवार को मजबूत करता है। वहीं, ओडिशा कांग्रेस प्रमुख भक्त चरण दास ने इसे BJP का खुला समर्थन करार दिया।

सीटों का बदलता गणित: कुल वोटरों पर असर

उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों (निर्वाचित और मनोनीत) से बने निर्वाचक मंडल द्वारा होता है। वर्तमान में लोकसभा में 543 सदस्य हैं (एक सीट रिक्त), जबकि राज्यसभा में 233 निर्वाचित + 12 मनोनीत = कुल 245 सदस्य। इस प्रकार, कुल निर्वाचक 788 हैं। लेकिन कुछ रिक्तियां और बहिष्कार के कारण वास्तविक वोटरों की संख्या प्रभावित हो रही है।

BJD के पास लोकसभा में 7 सांसद हैं (राज्यसभा में कोई नहीं), BRS के पास राज्यसभा में 4 सांसद (लोकसभा में शून्य), और SAD के पास लोकसभा में 1 सांसद। इनके बहिष्कार से कुल 12 सांसद वोट नहीं देंगे। यदि कोई अन्य अनुपस्थिति नहीं हुई, तो कुल वोट करने वाले सांसद 776 होंगे। जीत के लिए बहुमत (कुल वैध वोटों का आधा +1) अब 389 वोट का होगा। हालांकि, यदि कुछ और सांसद अनुपस्थित रहते हैं, तो यह संख्या और कम हो सकती है।

NDA के पास कुल 425 सांसद (लोकसभा में 293, राज्यसभा में 130) हैं। YSRCP जैसे दलों के समर्थन से यह संख्या 439 तक पहुंच सकती है। विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास लगभग 324 सांसद हैं। बहिष्कार से NDA को लाभ मिला है, क्योंकि ये वोट विपक्ष की ओर जा सकते थे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि सभी NDA सांसद एकजुट रहें, तो राधाकृष्णन आसानी से जीत जाएंगे। लेकिन गुप्त मतदान के कारण क्रॉस-वोटिंग की संभावना बनी हुई है।

BRS का ऐतिहासिक रुख: किसानों का समर्थन

BRS का यह फैसला 2022 के उपराष्ट्रपति चुनाव से अलग है, जब पार्टी ने विपक्षी उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को समर्थन दिया था। उस समय BRS के पास लोकसभा में 9 और कुल 16 सांसद थे। लेकिन अब, यूरिया संकट ने पार्टी को क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस करने के लिए मजबूर किया। केटीआर ने कहा कि BJP और कांग्रेस दोनों विफल रही हैं। तेलंगाना कांग्रेस ने इसे ‘बेतुका’ बताया, लेकिन BRS इसे किसानों के आक्रोश का प्रतीक मान रही है।

BJD-SAD के फैसलों के पीछे की वजहें

BJD का यह रुख वक्फ संशोधन विधेयक पर राज्यसभा में वोटिंग से जुड़ा माना जा रहा है। हाल ही में BJD के 5 सांसदों ने इसके पक्ष में वोट दिया था, जिससे विपक्षी दलों की आलोचना हुई। एक सांसद ने वोट नहीं किया, जबकि एक विरोध में बाहर रहे। इससे पार्टी की छवि प्रभावित हुई, इसलिए इस बार तटस्थता अपनाई गई। BJD पहले NDA का हिस्सा थी और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्रिमंडल में जगह मिली थी, लेकिन 2009 में गठबंधन से अलग हो गई। वर्तमान में वह किसी भी राष्ट्रीय गठबंधन से दूर है।

SAD का फैसला पंजाब में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति से प्रेरित है। पार्टी ने कहा कि राज्य की आपदा प्रबंधन प्राथमिकता है, इसलिए राष्ट्रीय चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे।
उम्मीदवारों का प्रोफाइल: दक्षिण भारत का मुकाबला

NDA के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन (67 वर्ष) तमिलनाडु से हैं और RSS से जुड़े हुए हैं। वे कोयंबटूर से दो बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं और तमिलनाडु BJP के पूर्व अध्यक्ष हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना और पुदुच्चेरी के राज्यपाल रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी नामांकन प्रक्रिया में समर्थन दिया।

विपक्ष के उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हैं और आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। इंडिया गठबंधन ने उन्हें संयुक्त उम्मीदवार बनाया है। रेड्डी ने सांसदों से अपील की है कि वे पार्टी से ऊपर उठकर देशहित में वोट दें। विपक्ष इसे ‘संविधान बनाम RSS-BJP’ की लड़ाई बता रहा है।
चुनाव की प्रक्रिया और महत्व

चुनाव आयोग ने दो पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की है। रिटर्निंग ऑफिसर राज्यसभा महासचिव पी.सी. मोदी हैं। मतदान के बाद तुरंत गिनती होगी। यह 1987 के बाद पहला मध्यावधि उपराष्ट्रपति चुनाव है। NDA की मजबूत स्थिति के बावजूद, 18 अस्पष्ट सांसदों (जिनका रुख स्पष्ट नहीं) के कारण रोमांच बरकरार है। BJP ने सांसदों को वोटिंग प्रक्रिया पर विशेष प्रशिक्षण दिया है।

यह चुनाव न केवल नए उपराष्ट्रपति का चयन करेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को भी रेखांकित करेगा। NDA की जीत तय लग रही है, लेकिन अंतिम परिणाम वोटिंग के बाद ही स्पष्ट होगा।

(यह लेख मूल विश्लेषण और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। कॉपीराइट एक्ट 1957 के अनुरूप, यह मूल सामग्री है और किसी अन्य स्रोत की नकल नहीं है।)

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