अंग्रेजों को धूल चटाने में माहिर थे नाना साहिब
जन्म – 8 दिसंबर 1824,वेणगाव, कर्जत, महाराष्ट्र
बलिदान – 24 सितम्बर 1859 (आयु 35)
पलवल-24 सितंबर
कृष्ण कुमार छाबड़ा
24 सितम्बर, 1859 को तीव्र बुखार के कारण मात्र 35 वर्ष की उम्र में नेपाल के ‘देवखारी’ गांव में नाना साहेब का देहांत हो गया । वहीं कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि अपने आखिरी दिनों में नाना साहेब गुजरात में थे। वहां वे ‘सिहोर’ में अपना नाम बदलकर रह रहे थे।
मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्रियों को पेशवा कहते थे। राजा का सलाहकार परिषद जिसे अष्टप्रधान कहते हैं; ये उसके सबसे प्रमुख होते थे। राजा के बाद इन्हीं का स्थान आता था। ‘पेशवा’ फारसी शब्द है जिसका अर्थ ‘अग्रणी’ है। पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन का, तथा पेशवा पद को वंशपरंपरागत रूप देने का क्रेडिट ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को जाता है।
🚩🇮🇳वीरता की मिसाल थे नाना
नाना साहेब सन 1857 के भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के शिल्पकार थे। उनका मूल नाम ‘धोंडूपंत’ था। स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहियों का नेतृत्व किया। नाना साहब ने सन् 1824 में वेणुग्राम निवासी माधवनारायण राव के घर जन्म लिया था। इनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा ने बालक नानाराव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का प्रबंध किया। उन्हें हाथी घोड़े की सवारी, तलवार व बंदूक चलाने की विधि सिखाई गई और कई भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी कराया गया।
🚩🇮🇳1857 गदर के हीरो थे

1857 में जब मेरठ में क्रांति का श्रीगणेश हुआ तो नाना साहब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांति की सेनाओं का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। क्रांति प्रारंभ होते ही उनके अनुयायियों ने अंग्रेजी खजाने से साढ़े आठ लाख रुपया और कुछ युद्धसामग्री प्राप्त की। कानपुर के अंग्रेज एक गढ़ में कैद हो गए और क्रांतिकारियों ने वहाँ पर भारतीय ध्वजा फहराई।
🇮🇳कानपुर में अंग्रेजों को धूल चटाई
1 जुलाई 1857 को जब कानपुर से अंग्रेजों ने प्रस्थान किया तो नाना साहब ने पूर्ण् स्वतंत्रता की घोषणा की तथा पेशवा की उपाधि भी धारण की। नाना साहब का अदम्य साहस कभी भी कम नहीं हुआ और उन्होंने क्रांतिकारी सेनाओं का बराबर नेतृत्व किया। फतेहपुर आदि के स्थानों में नाना के दल से और अंग्रेजों में भीषण युद्ध हुए। कभी क्रांतिकारी जीते तो कभी अंग्रेज। तथापि अंग्रेज बढ़ते आ रहे थे। इसके अनंतर नाना साहब ने अंग्रेजों सेनाओं को बढ़ते देख नाना साहब ने गंगा नदी पार की और लखनऊ को प्रस्थान किया।
नाना साहब ने महाराणा प्रताप की भाँति अनेक कष्ट सहे परंतु उन्होंने फिरंगियों और उनके मित्रों के संमुख आत्मसमर्पण नहीं। अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के निमित्त बड़े बड़े इनाम घोषित किए किन्तु वे निष्फल रहे। सचमुच नाना साहब का त्याग एवं स्वातंत्र्य, उनकी वीरता और सैनिक योग्यता उन्हें भारतीय इतिहास के एक प्रमुख व्यक्ति के आसन पर बिठा देती है।
अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के निमित्त बड़े बड़े इनाम घोषित किए किंतु वे निष्फल रहे। सचमुच नाना साहब का त्याग एवं स्वातंत्र्य, उनकी वीरता और सैनिक योग्यता उन्हें भारतीय इतिहास के एक प्रमुख व्यक्ति के आसन पर बिठा देती है।*

















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