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प्राइवेट स्कूलों की किताबों के नाम पर लूट: अभिभावकों की जेब पर दिनदहाड़े डाका, शासन-प्रशासन मौन

प्राइवेट स्कूलों की किताबों के नाम पर लूट: अभिभावकों की जेब पर दिनदहाड़े डाका, शासन-प्रशासन मौन

सत्यार्थ न्यूज  ब्यूरो चीफ

मनोज कुमार माली सोयत कला 

आगर मालवा शिक्षा सत्र 2025-26 की शुरुआत 1 जुलाई से हो चुकी है, लेकिन शिक्षा के इस पावन क्षेत्र को कुछ प्राइवेट स्कूलों ने खुला व्यापार बना दिया है। नर्सरी से लेकर कक्षा 4 तक की प्राइवेट किताबों के नाम पर अभिभावकों से हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं, जो शासन की एडवाइजरी और नीति दोनों की खुली अवहेलना है।

शासन के आदेशों की उड़ रही धज्जियां
शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी शासकीय और निजी विद्यालयों में NCERT की किताबें ही पढ़ाई जाएंगी ताकि शिक्षा की गुणवत्ता और समानता सुनिश्चित हो सके। लेकिन आगर मालवा जिले में अधिकांश प्राइवेट स्कूल इस आदेश को नजरअंदाज कर अपने स्वार्थ के चलते निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोप रहे हैं। इसका सीधा खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है।

कमीशन का खेल: 50% से 70% तक लाभ
सूत्रों के अनुसार जिले के आगर, बड़ोद, सुसनेर, तनोडिया, नलखेड़ा, पिपलोन, कंानड़ और सोयत सहित अन्य कस्बों में संचालित अधिकांश प्राइवेट स्कूलों ने अपने पसंदीदा दुकानदारों को किताबें बेचने के अधिकार दे रखे हैं। इन किताबों की कीमत 600 रुपये से शुरू होकर 2500 रुपये तक जाती है। वरिष्ठ कक्षाओं में भी 1000-1500 रुपये की प्राइवेट किताबें लगाई गई हैं। बताया जा रहा है कि इन पुस्तकों पर स्कूल संचालकों को 50% से 70% तक का कमीशन मिलता है, जो कि करोड़ों के खेल को जन्म दे रहा है।

अभिभावकों की मजबूरी और भय
कई अभिभावकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे शिकायत करने से डरते हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि ऐसा करने पर उनके बच्चों के साथ भेदभाव किया जा सकता है। उन्होंने मीडिया के माध्यम से शासन-प्रशासन से मांग की है कि इस लूट पर अंकुश लगाया जाए और शिक्षा के नाम पर हो रही इस व्यापारिक ठगी को रोका जाए।

किताबों के नाम पर करोड़ों की उगाही
जिले में करीब 250 प्राइवेट स्कूल संचालित हो रहे हैं जिनमें हजारों छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें से करीब 80% स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें अनिवार्य कर दी गई हैं। यदि आंकड़ों पर गौर करें तो यह एक करोड़ों रुपये का कमीशन कारोबार बन चुका है, जिसमें शिक्षा की जगह सिर्फ मुनाफा देखा जा रहा है।

प्रशासन की भूमिका संदिग्ध
प्राइवेट स्कूलों की इस मनमानी पर नियंत्रण की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। सवाल यह उठता है कि जब शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, तो फिर इसकी व्यवस्था व्यापार का रूप क्यों ले चुकी है?

कलेक्टर से न्याय की उम्मीद

जिले के कलेक्टर श्री राघवेंद्र सिंह अपनी ईमानदार छवि और कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं। जिलेवासी अब आशा लगाए बैठे हैं कि वे इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेकर ठोस कार्रवाई करेंगे। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन प्राइवेट स्कूलों को पुस्तकों की बिक्री वापस करवाने पर मजबूर करेगा या फिर यह मामला भी जांच और रिपोर्ट के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

शिक्षा को सेवा नहीं, व्यवसाय बना देने वाले ऐसे स्कूलों पर सख्त कार्यवाही जरूरी है। केवल एडवाइजरी और आदेशों से नहीं, बल्कि धरातल पर उतरकर इस लूट को रोकना होगा, ताकि आमजन को न्याय मिल सके और शिक्षा पुनः अपने मूल उद्देश्य की ओर लौट सके।

इनका कहना

प्राइवेट विद्यालयों के संबंध में निजी किताबों को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही है। कलेक्टर महोदय के निर्देश के उपरांत जुर्माना के साथ सख्त कार्रवाई संबंधित प्राइवेट स्कूल संचालको के खिलाफ की जाएगी।

एमके जाटव जिला शिक्षा अधिकारी आगर मालवा

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