• युद्धभूमि में खड़े कुंभकर्ण ने विभीषण की आंखों में झांक कर कहा।
सत्यार्थ न्यूज़ : “तुझे बड़ा प्रेम करता हूँ रे… मैं जानता हूँ कि तू सत्य की ओर खड़ा है, और इस युद्ध के बाद हमारे महान कुल में केवल तू ही बचेगा। फिर भी कहूँगा, तूने ठीक नहीं किया।” युद्धभूमि में खड़े कुंभकर्ण ने विभीषण की आंखों में झांक कर कहा।
विभीषण रो रहे थे। कारण कोई भी हो, पर अपने राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा व्यक्ति मुस्कुरा नहीं पाता। विभीषण लंका के विरुद्ध स्वयं नहीं गए थे, उन्हें परिस्थितियों ने लंका के विरुद्ध खड़ा किया था। बोले, “मेरे राम जानते हैं भइया, मैं राम के साथ किसी लोभ के कारण नहीं आया। पर क्या करता, मुझे महाराज ने राज्यसभा में अपमानित कर देश से निकल जाने को कहा। अब आपही बताइये, जिसे उसके अपने ही त्याग दें वह राम के अतिरिक्त और कहाँ जा सकता है?”
मैं तुम्हे गलत नहीं कह रहा भाई, पर तुम्हे सही भी तो नहीं मान सकता। कारण जो भी हो, पर इस युद्धभूमि में तुम लंका के विरुद्ध ही खड़े हो न?” कुंभकर्ण के स्वर में उलाहना या क्रोध नहीं, स्नेह था।
“राजा के विरुद्ध होना राज्य के विरुद्ध होना नहीं होता भैया। मैं महाराज के विरुद्ध हूँ पर लंका के विरुद्ध नहीं हूँ। लंका मुझे भी उतनी ही प्रिय है जितनी आपको या महाराज को है। मैं जानता हूँ कि विजय के बाद प्रभु श्रीराम लंका के किसी नर-नारी को पीड़ा नहीं देंगे।वे यहां माता सीता को ले जाने आये हैं, और उन्ही के साथ लौट जाएंगे। फिर मैं लंका का दोषी कैसे हूँ भैया?” विभीषण दुखी थे। यह मैं भी जानता हूँ भाई! राम इस युग के सत्य हैं। पर यह सही नहीं कि वे केवल देवी सीता के साथ चले जायेंगे। वे हमारे कुल, हमारी प्रतिष्ठा, हमारे स्वाभिमान का अंत कर के जाएंगे। और विश्व राम-रावण के इस संग्राम के साथ साथ यह भी स्मरण रखेगा कि रावण का भाई राम के साथ खड़ा था। राम के भक्त विभीषण को श्रद्धा के साथ स्मरण रखेंगे, किन्तु वे भी यह नहीं चाहेंगे कि उसके कुल में कोई विभीषण जन्म ले…” विभीषण टूटने लगे थे। हार कर बोले, “तो आप ही बताइये भइया, मैं अब क्या करूँ…”
कुंभकर्ण के मुख पर उदासी पसर गयी। बोले, “तू जहाँ है वहीं रह भाई… यही लंका के लिए अच्छा है। हमें तो अपने कर्मों का दण्ड भोगते हुए वीरगति पानी ही है, पर तू लंका का भविष्य है। तू ही है जो मृत्यु के बाद हमें पिंडदान देगा, पराजित लंका कल तुम्हारे ही प्रयासों से दुबारा पल्लवित होगी… राष्ट्र के लिए मरने से ज्यादा कठिन है राष्ट्र के लिए अपमानित जीवन जीना, तुम्हारे हिस्से में यही कठिन जीवन है। यह भी राष्ट्रप्रेम ही है भाई…”
विभीषण कुंभकर्ण को प्रणाम कर चल दिये। आगे वह युद्ध था जिसमें कुंभकर्ण को मुस्कुराते हुए मरना था और विभीषण को रोते हुए विजयी होना था। परिस्थितियों का खेल मनुष्य कभी समझ नहीं पाता।
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