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मंगल पांडेय की विद्रोह की आंधी से भड़की आजादी की चिंगारी।

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‘मंगल पांडेय’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला वीर सिपाही, जिसकी विद्रोह की आंधी भारत की आजादी में मील का पत्थर बनी। उन्होंने न केवल अंग्रेजों के अत्याचार का विरोध किया, बल्कि अपनी जान की परवाह किए बिना देश के लिए संघर्ष किया। उनकी वीरता और बलिदान ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित विद्रोह का मार्ग प्रशस्त किया। उनके इस योगदान को आज भी भारतीय इतिहास में गर्व के साथ याद किया जाता है। ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए। मोह ऐसा भंग हुआ कि ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती दी। अपनी तलवार की धार से ब्रिटिश अफसरों के सिर कलम कर दिए। उनका यह विद्रोह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी बनी। मंगल पांडेय का बचपन एक साधारण, लेकिन संस्कारवान ब्राह्मण परिवार में बीता। उनका जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडेय और माता का नाम अभैरानी था। परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध था। उनका बचपन गांव के प्राकृतिक परिवेश में खेल-कूद और खेती-बाड़ी के बीच बीता। मंगल पांडेय बचपन से ही निडर और साहसी थे, और उनकी नेतृत्व क्षमता भी बाल्यकाल से ही दिखाई देने लगी थी। वे गांव के अन्य बच्चों के साथ खेलते और अपनी नेतृत्व क्षमता के कारण जल्द ही सबके बीच लोकप्रिय हो गए। मंगल पांडेय का बचपन धार्मिक और पारंपरिक वातावरण में बीता। उनके परिवार ने उन्हें धर्म और संस्कृति के मूल्यों की शिक्षा दी। उस समय गांवों में औपचारिक शिक्षा का प्रचलन बहुत कम था, इसलिए मंगल पांडेय की प्रारंभिक शिक्षा भी गांव के पाठशाला में हुई, जहां उन्हें संस्कृत, धर्म और नैतिकता की शिक्षा दी गई।

उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती होना युवाओं के लिए एक आकर्षक अवसर माना जाता था, क्योंकि इसमें नियमित वेतन और स्थायी नौकरी मिलती थी। मंगल पांडेय ने किशोरावस्था में सेना में भर्ती होने का फैसला किया। मंगल पांडेय भी इसी आकांक्षा के साथ 1849 में 22 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए। उन्हें बंगाल नेटिव इन्फेंट्री (Bengal Native Infantry) की 34वीं रेजीमेंट में सिपाही के रूप में शामिल किया गया। मंगल पांडेय के अंदर अंग्रेजों के प्रति गुस्सा तब बढ़ा जब 1857 में ब्रिटिश सेना ने नई एनफील्ड राइफल का इस्तेमाल शुरू किया। इस राइफल के कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से काटना पड़ता था, और यह अफवाह फैल गई थी कि इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का उपयोग किया गया है। यह हिंदू और मुस्लिम सिपाहियों के लिए धार्मिक अपमान का कारण बना। मंगल पांडेय ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का निर्णय लिया और उन्होंने अपने साथियों को भी इसके खिलाफ प्रेरित किया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुली बगावत करने का मन बना लिया, जो बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडेय ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। उन्होंने अपनी रेजीमेंट के कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट बोघ और अन्य ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला कर दिया। यह घटना तब हुई जब मंगल पांडेय ने अपनी बंदूक से गोली चलाने की कोशिश की, लेकिन गोली मिसफायर हो गई। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी तलवार से ब्रिटिश अफसरों पर हमला जारी रखा। उनके इस विद्रोह ने पूरे बैरकपुर छावनी में सनसनी फैला दी। हालांकि, मंगल पांडेय को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर कोर्ट मार्शल किया गया। उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फांसी की सजा दी गई। उनकी फांसी से पहले उनके विद्रोह की खबर पूरे देश में फैल गई थी, और यह घटना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी बनी। उनके बलिदान ने पूरे देश में आजादी की लड़ाई को नई ऊर्जा और प्रेरणा दी।

मंगल पांडेय के विद्रोह ने पूरे देश में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की आग फैला दी। यह विद्रोह भारत के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और इसे ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहले संगठित प्रयास के रूप में देखा जाता है। हालांकि, यह विद्रोह अंततः असफल रहा, लेकिन इसने भारतीय जनता के मन में आजादी की भावना को प्रबल किया और आगे चलकर 1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। मंगल पांडेय का कोई विशेष नारा प्रचलित नहीं है, लेकिन उनकी वीरता और बलिदान के कारण उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम का पहला वीर सिपाही कहा जाता है। उनके कार्य ने “स्वराज” (आत्म-शासन) और “वंदे मातरम” जैसे नारों को प्रेरित किया, जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक बने।

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