महराजगंज शिव के गले में पड़ी मुण्ड माला का अद्धभुत रहस्य
(श्रावण मास पर विशेष प्रस्तुति)
भगवान शिव और सती का अद्भुत प्रेम शास्त्रों में वर्णित है।शिव और सती के अद्भुत प्रेम की कहानी से बड़ा कोई दूसरा कहानी,तीनों लोकों और चौदहों भुवन अर्थात पूरे ब्रह्मांड में कहीं देखने,सुनने को नहीं मिल सकता है।शिव और सती के अद्भुत प्रेम का प्रमाण है,महाराज दक्ष के यज्ञ कुण्ड में कूदकर सती का आत्मदाह करना,और सती के शव को उठाए क्रोधित शिव का तांडव करना।हालांकि यह भी शिव की लीला ही थी,क्योंकि इस बहाने शिव जी 51 शक्ति पीठों की स्थापना करना चाहते थे।शिव ने सती को पहले ही बता दिया था कि,उन्हें (सती को) यह शरीर त्याग करना ही है।
इसी समय उन्होंने सती को अपने गले में मौजूद मुंडों की माला का अद्भुत रहस्य भी बताया था।
मण्ड माला का अद्भुत रहस्य
एक बार नारद जी के उकसाने पर सती जी ने भगवान शिव से जिद करने लगी कि,आपके गले में जो मुंडों की माला है,उसका रहस्य क्या है…?जब काफी समझाने – बुझाने पर भी सती जी नहीं मानी, तो भगवान शिव ने आखिरकार रहस्य खोल ही दिया।शिव ने सती से कहा कि,इस मुंड की माला में जितने भी मुंड यानी सिर हैं,वह सभी आपके ही हैं।इस बात को सुनकर सती जी आश्चर्य से चकित रह गईं।
सती ने भगवान शिव से पूछा,यह भला कैसे संभव है कि सभी मुंड मेरे ही हैं…?
इस पर शिव बोले आगे आपका 108 वां जन्म होना है।इससे पहले आप 107 बार जन्म लेकर शरीर त्याग चुकी हैं,और ये सभी मुंड उन पूर्व जन्मों की निशानी है।जो अद्भुत प्रेम के रूप में मेरे पास धरोहर है।इस माला में अभी एक मुंड की कमी है,इसके बाद यह माला पूर्ण हो जाएगी।शिव की इस बात को सुनकर सती ने शिव से कहा की,मैं बार-बार जन्म लेकर शरीर त्याग करती हूं,लेकिन आप शरीर त्याग क्यों नहीं करते…?
*शिव हंसते हुए बोले* मैं अमर कथा जानता हूं,इसलिए मुझे शरीर का त्याग नहीं करना पड़ता है।इस पर सती ने भी अमर कथा जानने की इच्छा प्रकट की।शिव जब सती को अमर कथा सुनाने लगे तो,उन्हें (सती जी को) नींद आ गयी,इसलिए सती जी सम्पूर्ण अमर कथा सुन नहीं पाईं।जिस कारण उन्हें दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग करना पड़ा।
शिव ने सती के मुंड को माला में गूंथ लिया।इस प्रकार अब 108 मुंडों की माला तैयार हो कर सम्पूर्ण हो गयी।सती जी का अगला जन्म (महाराज हिमांचल के घर) पार्वती जी के रूप में हुआ।इस जन्म में पार्वती को अमरत्व प्राप्त होगा,और फिर उन्हें शरीर का त्याग नहीं करना पड़ा।
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