हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद जारी निर्माण कार्य, पेंड्रा नगर पालिका परिषद में नालंदा परिसर को लेकर बड़ा विवाद,
पेंड्रा में नालंदा परिसर निर्माण पर हाईकोर्ट का स्टे, फिर भी नहीं रुका काम,

सूरज यादव, गौरेला पेंड्रा मरवाही। छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा नगर में नालंदा परिसर निर्माण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। माननीय हाईकोर्ट द्वारा स्पष्ट रूप से निर्माण कार्य पर रोक (स्टे) लगाने के बावजूद भी संबंधित खसरा नंबर पर निर्माण कार्य लगातार जारी है, जिससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश, फिर भी नहीं रुका निर्माण
दिनांक 18 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने रिट याचिका क्रमांक 1167/2026 की सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया था कि खसरा नंबर 2370/1 पर अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने यह आदेश भूमि विवाद और प्रस्तुत तथ्यों को ध्यान में रखते हुए दिया था, ताकि यथास्थिति बनी रहे। लेकिन, जमीनी हकीकत इस आदेश के ठीक विपरीत दिखाई दे रही है।
स्टे के बाद भी जारी काम — सीधे अवमानना के आरोप
स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारी और साक्ष्यों के अनुसार, हाईकोर्ट के स्टे आदेश के बाद भी खसरा नंबर 2370/1 पर निर्माण कार्य लगातार जारी है। मौके पर मजदूर, निर्माण सामग्री और मशीनें सक्रिय हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आदेश का पालन नहीं किया जा रहा। यह स्थिति सीधे तौर पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में आती है, जो एक गंभीर कानूनी उल्लंघन है।

मामले का एक और अहम पहलू यह है कि नालंदा परिसर निर्माण के लिए शासन स्तर पर खसरा नंबर 2379/1 से लगभग एक एकड़ भूमि का प्रस्ताव भेजा गया था। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि खसरा 2379/1 में हाई स्कूल का आम का बगीचा स्थित है, यह भूमि शिक्षा विभाग के अधीन है, और इस पर निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई अनिवार्य होगी। इसके विपरीत, निर्माण कार्य खसरा नंबर 2370/1 में किया जा रहा है, जो वर्तमान में न्यायालय में विवादित है और जिस पर स्टे लागू है।

खसरा 2379/1 की भूमि पहले ही आंशिक रूप से अन्य कार्यों में उपयोग हो चुकी है और वर्तमान में जो हिस्सा बचा है, वह हाई स्कूल का आम का बगीचा है। इस बगीचे को काटकर निर्माण करने की आशंका ने स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ा दी है। नागरिकों का कहना है कि यह न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि स्कूल के छात्रों के हितों के भी खिलाफ है। नालंदा परिसर निर्माण के लिए लगभग ₹4.29 करोड़ की लागत निर्धारित की गई है। इस प्रकार की परियोजना के लिए न्यूनतम एक एकड़ भूमि और शांत वातावरण अनिवार्य होता है। लेकिन जिस प्रकार से भूमि चयन और निर्माण प्रक्रिया में विरोधाभास सामने आ रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियमों का पालन किया जा रहा है।

आचार यह भी है कि संबंधित अधिकारियों द्वारा शासन को भ्रामक जानकारी देकर प्रस्ताव भेजा गया, जिसमें एक खसरा नंबर दर्शाया गया, जबकि निर्माण दूसरे स्थान पर किया जा रहा है। इससे पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। स्थानीय नागरिकों में इस पूरे मामले को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि जब हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दे दिया है, तो उसके बावजूद निर्माण कैसे जारी है? क्या प्रशासन खुद को कानून से ऊपर समझने लगा है?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्टे आदेश के बाद भी निर्माण कार्य जारी रहता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई हो सकती है। इसमें न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत पेशी, आर्थिक दंड और अन्य कठोर कदम शामिल हो सकते हैं। पेंड्रा का यह मामला अब प्रशासन और कानून के बीच टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है। एक ओर हाईकोर्ट का स्पष्ट स्टे आदेश, दूसरी ओर उसी खसरा पर जारी निर्माण कार्य। अब देखना यह होगा कि इस गंभीर उल्लंघन पर प्रशासन क्या कदम उठाता है और क्या न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित किया जाता है या नहीं।















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