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विजयराघवगढ़ किले की विरासत पर संकट: पुरातत्व विभाग की उदासीनता से जागा आक्रोश, जनप्रतिनिधि खामोश

विजयराघवगढ़ किले की विरासत पर संकट: पुरातत्व विभाग की उदासीनता से जागा आक्रोश, जनप्रतिनिधि खामोश


कटनी, 10 अक्टूबर 2025 (हरिशंकर पाराशर)सत्यार्थ न्यूज: मध्य प्रदेश के कटनी जिले में स्थित ऐतिहासिक विजयराघवगढ़ किले की धरोहर अब धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है। 1857 की क्रांति के नायक राजा सरयूप्रसाद के इस गौरवपूर्ण किले का संरक्षण करने की जिम्मेदारी उठाने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग की लापरवाही ने स्थानीय नागरिकों में गुस्सा भरा दिया है। गुरुवार को किले परिसर में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में जागरूक नागरिकों ने विरासत बचाओ अभियान की रूपरेखा तैयार की और शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने का संकल्प लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब जनता सड़कों पर उतर रही है, तब जनप्रतिनिधि क्यों खामोश हैं? क्या वोट की राजनीति के आगे ऐतिहासिक धरोहरें बेमानी हो गई हैं?
विजयराघवगढ़ किला, जो 1826 में राजा प्रयागदास द्वारा निर्मित एक वास्तुशिल्पीय चमत्कार है, न केवल 1857 की क्रांति का प्रतीक है, बल्कि कटनी की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग भी। यहां की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशियां, रंगमहल की भव्यता और रानीवास की संरचना पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। लेकिन वर्षों से उपेक्षित यह किला अब जंग, वर्षा और अवैध अतिक्रमण का शिकार हो रहा है। इतिहासकार ठाकुर राजेंद्र सिंह और मोहन नागवानी ने बैठक में चिंता जताते हुए कहा, “यह किला ब्रिटिश कमिश्नर पर पहला गोली चलाने वाले राजा सरयूप्रसाद की वीरता का साक्षी है। अगर इसे नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।” उन्होंने जोर देकर कहा कि लोगों में इतिहास के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए तत्काल अभियान चलाना जरूरी है, क्योंकि “जब लोग अपना इतिहास जानेंगे, तभी जागेंगे।”
बैठक में करीब पांच घंटे तक चली चर्चा में किले के संरक्षण, स्थानीय इतिहास के संकलन और पर्यटन विकास पर गहन विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान ‘विजयराघवगढ़ विरासत गौरव मंच’ समिति का गठन किया गया, जो आगे चलकर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने और जनजागरण अभियान चला सकता है। समिति में ठाकुर राजेंद्र सिंह, मोहन नागवानी, शहजाद हुसैन रिजवी, सुभाष दुबे, श्रवण बागरी, कुमारी छबि ताम्रकार, कुंवर अभिजीत सिंह, रामनारायण ‘गुड्डा’ सोनी, अमन सोनी, हर्ष नामदेव, मनोरमा सिंह कैमोर और अजय त्रिपाठी जैसे सक्रिय नागरिक शामिल हैं। ये लोग न केवल शहर के जिम्मेदार नागरिक हैं, बल्कि वे प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने के लिए वर्षों से प्रयासरत हैं।
लेकिन यह अभियान पुरातत्व विभाग की निष्क्रियता के बिना अधूरा है। एएसआई का मध्य क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल में स्थित होने के बावजूद, कटनी जैसे संवेदनशील जिले में कोई स्थायी इकाई नहीं है। जिले में प्राचीन धरोहरों की भरमार है—बिलहरी की पुष्पवती नगरी से लेकर रूपनाथ धाम तक—लेकिन विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि विभाग की उदासीनता के कारण किले की दीवारें जीर्ण-शीर्ण हो रही हैं, जबकि बजट आवंटन के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई हो रही है। “प्रशासन तो दबाव में आता है, लेकिन पुरातत्व विभाग की चुप्पी निराशाजनक है। क्या राष्ट्रीय धरोहर का संरक्षण इतना कठिन है?” एक युवा कार्यकर्ता ने सवाल उठाया।
इस बीच, जनप्रतिनिधियों की खामोशी सबसे बड़ा सवाल बन गई है। विजय राघवगढ़ के विधायक और सांसद, जो चुनावी वादों में पर्यटन और विकास की बातें करते हैं, अब तक इस मुद्दे पर चुप हैं। क्या वे सत्ता के गलियारों में व्यस्त हैं या धरोहर संरक्षण उनकी प्राथमिकता में ही नहीं? आम जनता का गुस्सा अब सड़कों पर उतरने को तैयार है। विरासत गौरव मंच ने चेतावनी दी है कि अगर शासन ने तत्काल कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन तेज होगा। कटनी की इन प्राकृतिक-अऐतिहासिक धरोहरों को बचाना न केवल जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा अभियान बन सकता है। समय रहते जागें, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

(लेखक: हरिशंकर पराशर,  कटनी। संपर्क: harishankar.parashar@email.com)

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