निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी महाराज के ससंघ सानिध्य में मना पाठशाला का 22 वां वार्षिकोत्सव

(मध्य प्रदेश गुना रिपोर्टर अभिषेक शर्मा)
कलश स्थापना के साथ हुआ कार्यालय का उद्घाटन, बच्चों ने दी फास्ट फूड अभिशाप पर प्रस्तुति
संयम से बड़ा कोई मित्र नहीं- मुनिश्री निर्भीक सागरजी
गुना। आचार्यश्री विद्यासागरजी दिगंबर जैन पाठशाला बड़ा जैन मंदिर का 22 वां वार्षिकोत्सव कलश स्थापना रविवार को निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी महाराज के ससंघ सानिध्य में चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर भवन में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण, आचार्यश्री के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन से प्रारंभ हुआ। पाठशाला में संस्कारवान परिवार की बहनें जो, निस्वार्थ भाव से प्रतिदिन बच्चों को धार्मिक लौकिक शिक्षा के साथ संस्कार देती हैं, ऐसी बहनों के माता-पिता एवं बहनों का प्रबंधकारिणी समिति के सभी पदाधिकारियों द्वारा सम्मानित किया गया। इस अवसर पर पाठशाला के ही बच्चों द्वारा पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित फास्ट फूड एक अभिशाप नाटिका का मंचन किया गया। वहीं कूपन ड्रा के माध्यम से पाठशाला कलश स्थापना, मां जिनवाणी को विराजमान करने सहित अन्य कार्यों के लिए पात्रों का चयन किया गया। इस अवसर पर पाठशाला कार्यालय का उद्घाटन हुआ।

ऑनलाईन पढ़ाई और फास्टफूड नहीं हो सकते भारतीय संस्कृति के हिस्से
इस मौके पर मुनिश्री निर्भीक सागरजी महाराज ने कहा कि दुनिया में संयम से बड़ा मित्र और असंयम से बड़ा शत्रु कोई दूसरा नहीं हो सकता। आज पाश्चात्य संस्कृति पूरी तरह पैर पसार चुकी है लोग इस प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते हुए वह सब कुछ स्वयं खा रहे हैं और अपने बच्चों को खिलाकर पाप कर रहे हैं। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज कहा करते थे कि यदि हमने खानपान पर ध्यान नहीं दिया और हिंसा से बनी विदेशी वस्तुओं को खाने पीने में उपयोग किया तो आगामी समय में प्रत्येक घर में एक कैंसर का मरीज होगा।

इस अवसर पर मुनिश्री ने पाठशाला के बच्चों द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि यदि हमने इन हिंसा से बनी वस्तुएं जिसमें ऐसी हिंसक वस्तु मिली रहती है वह एक बार मुंह में आ जाए तो बार-बार खाने को मन करता है। वहीं वस्तुएं हमारे शरीर को रोगी बना देती है और आगे चलकर ब्लटप्रेशर, शुगर, कैंसर जैसे रोग घरों में प्रवेश कर जाते हैं। हमें अपने परिवार को बच्चों को इससे बचाना चाहिए। फास्टफूड, फास्टफूड नहीं मांसाहार है। उसकी जगह ड्रायफूट्स, फल, हरी ताजा सब्जी का उपयोग करें। उनमें शरीर को पुष्ट करने की क्षमता होती है। जो बच्चे इन फास्ट फूड के आदि हो जाते हैं उन्हें अपने माता-पिता यदि पैसे नहीं देते तो हिंसक तक हो जाते हैं। इस मौके पर मुनिश्री ने ऑनलाईन पढ़ाई, टैपटॉप, कम्प्यूटर, मोबाईल द्वारा की जा रही शिक्षा पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह भारतीय शिक्षा पद्धति नहीं है। गुरुओं के सामने बैठकर जो ज्ञान शिक्षा प्राप्त की जाती है वह भारतीय संस्कृति होती है।
भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने समाज स्कूल खोले- निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी

इस अवसर पर निर्यापक मुनिश्री योग सागर जी महाराज ने पाठशाला के कार्यक्रम एवं प्रस्तुति को देखकर कहा कि अब यह सब देखकर मालूम पड़ता है कि गुना में इसलिए प्रतिवर्ष चातुर्मास होते हैं। इतनी अच्छी पाठशालाओं में ज्ञान, संस्कार दिए जाते हैं आपका पुण्य इतना बड़ा है कि हमको भी गुना में चातुर्मास करना पड़ा। इस अवसर पर मुनिश्री ने फास्ट फूड का त्याग करने का आव्हान करते हुए कहा कि जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन। उन्होंने बिना भूख के खाने को विकृति एवं भूख लगने पर खाने को संस्कृति बताया। उन्होंने कहा कि हमें मैडम, हैलो, आदि शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गुना में संस्कार एवं ज्ञान, संस्कृति, भारतीय पद्धति पर आधारित हो, इसके लिए समाज को स्कूल खोलना चाहिए। अंत में मां जिनवाणी की स्त़ति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
2004 से निरंतर हो संचालित हो रही हैं पाठशालाएं

इस बारे में पाठशाला की संचालिका बह्मचारिणी दीदी पल्लवी जैन ने बताया कि पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर संचालित आचार्यश्री विद्यासागर दिगंबर बड़ा जैन मंदिर पाठशाला की स्थापना 8 अगस्त 2004 को निर्यापक मुनिश्री प्रशांत सागरजी एवं मुनिश्री निर्वेग सागर महाराजजी की प्रेरणा से की गई थी। इस वर्ष पाठशाला का 22वां वर्ष मनाया गया। पाठशाला का संचालन धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार हेतु किया जा रहा है। वर्तमान में पाठशाला में प्रतिदिन रात्रि 7:30 से 8:30 बजे तक कक्षा संचालित होती है, जिसमें लगभग 150 बच्चे एवं 150 महिलाएं नियमित रूप से धर्म, संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। पाठशाला में सबसे छोटे बच्चों से लेकर प्रौढ़ महिलाएं-पुरुष तक धर्म के पथ पर अग्रसर हैं। इस पाठशाला की एक विशेष उपलब्धि यह भी है कि यहां सेवा देने वाली 18 दीदियों में से कई उच्च शिक्षित हैं। आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी के आशीर्वाद से इस पाठशाला से प्रेरणा पाकर 38 दीदियां प्रतिभास्थली जैसे संस्थानों में बच्चों को शिक्षित कर रही हैं। दीदी सुश्री जैन के अनुसार पाठशाला में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा के अतिरिक्त विविध गतिविधियाँ भी नियमित रूप से होती हैं।

प्रत्येक रविवार को सामूहिक पूजन एवं स्वल्पाहार, प्रत्येक शनिवार को खेलकूद की गतिविधियाँ, समय-समय पर तीर्थ यात्रा, महाराजजी एवं माताजी के दर्शन हेतु सामूहिक दर्शन यात्राएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। वह बताती हैं कि बड़ा जैन मंदिर के अलावा शहर के अन्य सभी मंदिरों पर पाठशालाएं संचालित हैं। इन पाठशालाओं का मूल उद्देश्य है अच्छे संस्कारों का अर्जन एवं धार्मिक ज्ञानार्जन, जिससे स्वस्थ मन, स्वस्थ तन और स्वस्थ वतन का निर्माण हो सके। उल्लेखनीय है कि यह पाठशालाएं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है, जो सतत सेवा और समर्पण के भाव से नई पीढ़ी को धर्मपथ की ओर प्रेरित कर रही है।(मध्य प्रदेश गुना रिपोर्टर अभिषेक शर्मा)


















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