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शिक्षक राष्ट्र के भाग्य के निर्माता होते हैं

सोलन से पवन कुमार सिंघ क़ी रिपोर्ट 

शिक्षक दिवस विशेष पर आलेख एच डी शर्मा टीचर एजुकेटर वी एस एल एम कॉलेज ऑफ़ एजूकेशन चंडी सोलन

शिक्षक राष्ट्र के भाग्य के निर्माता होते हैं

शिक्षक ही विद्यालय तथा शिक्षा पद्धति की वास्तविक गत्यात्मक शक्ति है l यह सत्य है कि विद्यालय भवन ,पाठ्य सहगामी क्रियाएं ,निर्देशन कार्यक्रम , पाठ्य पुस्तकें आदि सभी वस्तुएं शैक्षिक कार्यक्रम में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है, परंतु जब तक उनमें अच्छे शिक्षकों द्वारा जीवन शक्ति प्रदान नहीं की जाएगी तब तक वे निरर्थक रहेगी l शिक्षक ही वह शक्ति है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आने वाली पीडयों पर अपना प्रभाव डालती है l lशिक्षक ही राष्ट्रीय एवं भौगोलिक सीमाओं को पार कर विश्व व्यवस्था तथा मानव जाति को उन्नति के पथ पर अग्रसर करता है l अतः यह कहा जा सकता है कि मानव -समाज एवं देश की उन्नति उत्तम शिक्षकों पर निर्भर है l शिक्षक राष्ट्र के भाग्य -निर्णायक है l यह कथन प्रत्यक्ष रूप से सत्य प्रतीत होता है परंतु अब इस बात पर अधिक बल देने की आवश्यकता है कि शिक्षक ही शिक्षा के पुनर्निर्माण की महत्वपूर्ण कुंजी है l यह शिक्षक वर्ग की योग्यता ही है जो की निर्णायक है l माध्यमिक शिक्षा आयोग ने अपने प्रतिवेदन में लिखा की अपेक्षित शिक्षा के पुनर्निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण तत्व शिक्षक -उसके व्यक्तिगत गुण ,उसकी शैक्षिक योग्यताएं, उसका व्यावसायिक प्रशिक्षण ओर उसकी स्थिति जो वह विद्यालय तथा समाज में ग्रहण करता ही है l विद्यालय की प्रतिष्ठा तथा समाज के जीवन पर उसका प्रभाव निसंदेह रूप से उन शिक्षकों पर निर्भर है जो कि उस विद्यालय में कार्य कर रहे हैं l इस प्रकार शिक्षक का महत्व समाज तथा शिक्षा पद्धति दोनों में ही l स्पष्ट है वस्तुतः शिक्षक उन भावी नागरिकों का निर्माण करता है जिनके ऊपर राष्ट्र के उत्थान एवं पठन का भार है l शिक्षक वह धुरी है जिसके चारों ओर सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली चक्कर लगाती है l

आदर्श शिक्षक को मनुष्यों का निर्माता , राष्ट्र निर्माता ,शिक्षा- पद्धति की आधारशिला, समाज को गति प्रदान करने वाला आदि सब कुछ माना गया है l साधारणत: ऐसे शिक्षक में बालकों को समझने की शक्ति, उसके साथ उचित रूप से कार्य करने की क्षमता , शिक्षण योग्यता, कार्य करने की इच्छा शक्ति और सहकारिता आदि गुणो की अपेक्षा की जाती है l ऐसे गुण सामानयत: ना तो प्रत्येक शिक्षक में मिलते हैं और ना ही शिक्षण प्रत्येक व्यक्ति का कार्य ही है l वस्तुतः यह कार्य वह व्यक्ति कर सकता है जिसमें कुछ विशिष्ट शारीरिक, बौद्धिक ,सामाजिक नैतिक एवं संवेगात्मक गुण हो l शिक्षण जगत की यह मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क का मस्तिष्क से संबंध स्थापित किया जाता है l इस संबंध की उपयुक्त तथा एवं अनुपयुक्तता बहुत कुछ शिक्षक के व्यक्तित्व पर निर्भर होती है l राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने भी खेद के साथ यह कहा था कि शिक्षकों के आदर्श एवं व्यवहार में प्राय: समाजस्य नहीं हो पाता,वे कहते कुछ है और करते कुछ है l अतः एक अच्छे शिक्षक के कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए l सफल शिक्षक के लिए जीवन शक्ति का होना आवश्यक है ,यह केवल इसलिए ही आवश्यक नहीं है कि उसका प्रभाव बालको पर प्रतिबिंबात्मक रूप से पड़ेगा परंतु थकान से उत्पन्न हुई बाधाओं को कम करने के लिए भी यह आवश्यक है l भावी शिक्षक अपने छात्रों पर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालने से बहुत कम संबंध रखेगा l इसके विपरीत वह अपने छात्रों के व्यक्तित्व को समझने तथा प्रत्येक में उसे दीपशिखा को खोजने का प्रयत्न करेगा जो कि उनके व्यक्तित्व को प्रकाशित करती है,तथा उस शक्ति स्रोत को खोजेगा, जो उनको प्रेरित करती है l इस संबंध में विद्वानों का मत है कि एक अयोग्य चिकित्सक मरीज के शारीरिक हित के लिए खतरनाक है परंतु एक अयोग्य शिक्षक राष्ट्र के लिए इससे भी अधिक घातक है ,क्योंकि वह न केवल अपने छात्रों के मस्तिष्क को विकृत बनता है और हानि भी पहुंचाता है, साथ ही उनके विकास को अवरुद्ध करता है और उनकी आत्मा को मरोड़ देता है l इसलिए एक अच्छे शिक्षक से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विषय का सदा विद्यार्थी बना रहे l एक अच्छे शिक्षक का प्रथम गुण यह है कि एक अध्यापक हो और कुछ नहीं, और उसको एक शिक्षक के रूप में ही प्रशिक्षित किया जाए l उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि जब उसने इस व्यवसाय को ग्रहण किया है, तब उसे इसमे पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य करना चाहिए l शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों का कार्य एक महत्वपूर्ण निवेश है l अंतिम विश्लेषण में जो भी नीतियां निर्धारित की जाए उन्हें शिक्षकों द्वारा ही कार्यस्थ तथा क्रियान्वयन किया जाना होगा और ऐसा उन्हें अपने व्यक्तिगत उदाहरण तथा अपनी अध्ययन शिक्षण प्रक्रिया के माध्यम से करना होगा l अध्यापकों का चयन और प्रशिक्षण उनकी योग्यता, गतिशीलता, कार्य की परिस्थितिया उनके कार्य निष्पादन पर प्रभाव डालते हैं l शिक्षको का वेतन तथा सेवा की शर्तें उनकी सामाजिक और व्यावसायिक दायित्वों के अनुरूप हो और ऐसे हो जिनसे प्रतिभाशाली व्यक्ति शिक्षण व्यवसाय की ओर उत्कृष्ट हो सके l शिक्षकों के उत्तरदायित्वों के मानदंड निर्धारित किये जाये जिसमें उनको अच्छे कार्य निष्पादन के लिए प्रोत्साहित एवं प्रोत्साहन दिए जाएं l शिक्षकों का उत्तरदायित्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है l शिक्षकों को विद्यालय में ऐसा सुंदर वातावरण निर्मित करना होगा जिसमें बालकों की छिपी प्रतिभाएं निखर सके l यह वातावरण छात्रों को ऐसे भाऐ की वे विद्यालय में जाने में खुशी का अनुभव कर सके l अतः शिक्षक को आज की परिस्थितियों में उत्तरदाई बनाने के लिए उसकी जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए l किसी भी समाज में शिक्षकों के स्तर से उनकी सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्थिति का पता लगता है l कहा जाता है कि कोई भी राष्ट्र अपने शिक्षकों के स्तर से ऊपर नहीं हो सकता l अतः राष्ट्र के विकास एवं इसकी समृद्धि में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता प्रदान की गई है l भावी एवं आधुनिक अध्यापक को आधुनिक शैक्षिक तकनीको एवं नवाचारों के साथ छात्र केंद्रित बाल मनोविज्ञान पर आधारित शिक्षा पद्धति को अपनाते हुए विद्यार्थियों की मनोस्थितियों को समझते हुए शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को अपनाना होगा l

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