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बस्तर: पुनर्जागरण एवं मानवतावाद की खोज में

विशेष संवाददाता :- राजेन्द्र मंडावी                                                  बस्तर: पुनर्जागरण एवं मानवतावाद की खोज में

 

 

कांकेर। भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष एवं आदिवासी किसान नेता संजय पंत ने प्रेस नोट जारी कर बस्तर क्षेत्र की वर्तमान परिस्थितियों के लिये सकारात्मक टिप्पणी करते हुए क्षेत्र के आदिवासी किसान समाज हेतु पुनर्जागरण एवं मानवतावाद दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया है।

किसान नेता आगे कहते हैं कि पुनर्जागरण का अर्थ होता है फिर से जागना और जिस प्रकार यूरोपीय समाज में पुनर्जागरण काल के बाद नयी चेतना का विकास हुआ ठीक उसी प्रकार बस्तर के आदिवासी किसान भाइयों को भी नयी चेतना का विकास करते हुए अपने हक एवं अधिकारों के लिए जागना होगा। गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी, कुपोषण, पिछड़ापन, चरम सीमा के भ्रष्टाचार एवं दर्दनाक पुलिस-नक्सली हिंसा जैसी सामाजिक बेड़ियों से मुक्त होकर आदिवासी किसान भाइयों के लिए दुनिया के लिए मिसाल कायम करने का समय आ गया है। देश दुनिया को लोहे का निर्यात करने वाले बस्तर के आदिवासी समाज में इतनी क्षमता है कि हाल ही में संपन्न हुए पेरिस ओलंपिक खेलों में एक भी स्वर्ण पदक से वंचित हमारे देश पर सोने की बरसात कर देती। यदि पिछड़ापन आड़े नहीं आता तो डीआरडीओ एवं इसरो जैसी वैज्ञानिक संस्थानों में बस्तर के आदिवासी किसान भाइयों की तूती बोलती। नक्सली-पुलिस हिंसा के कारण दक्षिण बस्तर के बर्बाद हो चुके स्कूलों ने आदिवासी किसान भाइयों की एक बड़ी आबादी को यूपीएससी, पीएससी, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, वकालत जैसे शिक्षामूलक रोजगारों से दूर रखा क्योंकि पूंजीवादी एवं शोषणकारी ताकतें आदिवासी किसान भाइयों को ड्राइविंग सीट पर बर्दाश्त ही नहीं कर सकती है। देश एवं दुनिया को ज्ञान का मार्ग दिखाने की क्षमता रखने वाले आदिवासी किसान भाइयों को साजिशन पिछड़ा रखने के लिए क्षेत्र में प्रचलित बोलियां एवं भाषाओं गोंडी, हलबी, भतरी का शब्दकोश आज तक नहीं बनाया गया है। प्राकृतिक न्याय तो यही कहता है कि प्रकृति के सच्चे रक्षक आदिवासी किसान भाई इस धरती के प्रथम निवासी हैं तथा जल, जंगल एवं जमीन पर सर्वप्रथम एवं सबसे अधिक इनका ही हक है। किसान नेता आगे कहते हैं कि नक्सलवादियों को मारने के लिए पाताल लोक तक जाने की चाह रखने वालों को काश इस धरती लोक में ही बस्तर के आदिवासी किसान भाइयों का दर्द एवं आंसू दिख जाता। बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा गांव में सोलह निर्दोष आदिवासी किसान भाइयों के फर्जी एनकाउंटर मामले में जांच आयोग की रिपोर्ट आए हुए पाँच साल बीत चुके हैं एवं छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री को शपथ लिए हुए आठ महीने बीत चुके हैं लेकिन परिवार वालों को अब तक न्याय नहीं मिला। फिर से जागने की यह प्रक्रिया आदिवासी किसान भाइयों के आत्म विश्लेषण से शुरू होती है। अपनी गलतियों को सुधारते हुये एकता का परिचय देकर बस्तर का आदिवासी किसान अपने गौरवशाली इतिहास को दोहरा सकता है।

पूंजीवादी एवं शोषणकारी ताकतों द्वारा बस्तर के आदिवासी किसान समाज में भाई के हाथों भाई को मरवाने की साजिश को तोड़ने का एक ही उपाय है और वह है स्वयं को किसान मानना। एक बार आदिवासी भाई स्वयं को किसान मान लें, बस्तर क्षेत्र हिंसा मुक्त हो जाएगा क्योंकि किसान भाई पैदा करता है मारता नहीं है। बस्तर की वर्तमान हालात देखकर आरक्षित सीटों से चुने गए जनप्रतिनिधियों एवं आरक्षित श्रेणी से चुने गए अधिकारियों के लिए कबीर का यह दोहा तर्कसंगत है कि- “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।” अर्थात सत्ता एवं पद पाने के बाद खजूर का पेड़ ना बने क्योंकि जनता की ऊंचाई खजूर के पेड़ जितनी नहीं हो सकती है। जल, जंगल और जमीन की इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के हिंसा का विरोध करते हुए भारतीय किसान यूनियन आदिवासी किसान भाइयों के साथ पूरी मजबूती दिखाता है। किसान शब्द स्वयं को धनवान महसूस कराता है, आर्थिक एवं सामाजिक दोनों रूपों में। बस्तर क्षेत्र में पुनर्जागरण एवं मानवतावादी दृष्टिकोण लाने का कार्य एवं श्रेय एक आम आदिवासी किसान भाई को ही जाएगा। हिंसा के खूनी खेल से एक सफल किसान बनने का सफर अत्यंत ही रोचक एवं सुखदायी होगा।

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