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सोलन-योग आत्म ज्ञान का सशक्त साधन है l

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योग आत्म ज्ञान का सशक्त साधन है l

चड़ी से पवन कुमार सिंघ की रिपोर्ट
चंडी सोलन
जैसा हम सबको विधित है कि हर वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाते हैं l यह दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की परंपरागत विरासत योग के महत्व को दर्शाता है परंतु हमें योग को ना मात्र एक दिन मना कर केवल औपचारिकता नहीं निभानी है अपितु इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग मानना चाहिए क्योंकि आज के इस भौतिकतावादी युग में व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य असंतुलित हो गया है l इसके लिए आवश्यकता है शरीर को हर्षिठ- पुष्ट एवं निरोग बनाए रखने के लिए योग शिक्षा की जो एक अमूल्य औषधि है l आज देश, समाज तथा व्यक्ति को औषधिविहीन व्यक्ति तथा अपराध विहीन समाज की आवश्यकता है l इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि आज पुस्तकालयों की अपेक्षा खेल के मैदाने की आवश्यकता है l स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का विकास होता है l योग ही ऐसा सशक्त साधन है जो व्यक्ति को स्वस्थ बनाता है l योग दर्शन के गुरु महर्षि पतंजलि को माना जाता है l योग के बारे में लोगों की अलग-अलग धारणाएं हैं l इस समय कुछ लोग योग को कई प्रकार से संदेह की दृष्टि से देखतें हैं जबकि हमारे ऋषि मुनियों ने इसे बहुत अनुभव के बाद हमारे सामने रखा था l ऐसा प्रतीत होता है कि इस योग के अर्थ तथा मूल्य को वास्तव में हम भूल रहे हैं जो किसी समय भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग होता था l योग का अर्थ आत्मज्ञान द्वारा परमात्मा से मिलना है l बाकी जो संसार के मिलन है वह आध्यात्मिक नहीं अपितु सांसारिक है क्योंकि सांसारिक मिलन हमें अस्थाई एवं क्षणिक सुख ही प्रदान करता है l जो परम तत्वों के मिलन में साधन नहीं बन सकते इसलिए वह मार्ग तो सभी को आत्मज्ञान द्वारा ही पार करना होता है किंतु अंतिम लक्ष्य प्राप्ति के लिए शरीर को ठीक रखकर मन को एकाग्र करके आत्मज्ञान को प्राप्त करना जरूरी है l जो योग को जानकर ही संभव है l आसनों को करने से शरीर की वृद्धि एवं पुष्टि होती है l शरीर स्वस्थ होता है l योग के लिए शरीर को ठीक रखना आवश्यक है lशरीर से आगे अंत है lभगवान श्री कृष्ण ने गीता में त्याग के बारे में बहुत कुछ बताया और मन की चंचलता को दूर करने के साधन भी बताएं l उनमें प्राणायाम भी मन को एकाग्र करने का एक तरीका है क्योंकि वायु ही हमारे स्वास्थ्य को बनाती है l यही हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखती है और हमारी प्राण वायु को लंबा करती है l प्राणायाम द्वारा हम अपने मन को शांत कर सकते हैं l जब हम वासनाओं से पीड़ित होते हैं तब उन्हें वश में करने के लिए प्राणायाम लाभदायक सिद्ध होता है l यदि कामवासना परेशान करें या चिंता अधिक हो हमें छः बार बार प्राणायाम करना चाहिए l लंबे तथा गहरी सांस लेकर छोड़ें l प्राणायाम से जब हमारा मन एकाग्र हो जाता है l हमारा मन ध्यान में लगने लग जाता है l हमारे मन की भ्रांतियां शांत होती है ,तो फिर हम ध्यान की ओर आगे बढ़ते हैं l ध्यान में प्रारंभिक चरण में बहुत सारी दिक्कत आती है l कभी मन परेशान करता है तो कभी शरीर के बैठने में शक्ति नहीं होती और कभी संसार की इच्छाएं और वासनाएं तंग करती है परंतु धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा हम इन सभी विघ्नों को पार कर स्वाभाविक रूप से अपने मन को स्थिर एवं शांत कर सकते हैं l योग में जल्दी करने से कुछ नहीं होता l जब संसार से ध्यान थोड़ा हटकर कम होता है तो अध्यात्म की ओर जाना शुरू हो जाता है l मन को वश में करने मे योग अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है lकई बार हम हम अध्यात्म में स्थिर नहीं पाते क्योंकि हमारा ध्यान और अभ्यास तो संसार में अधिक है l इसलिए संसार की वासनाओं एवं इच्छाओं को मन से पूरी तरह अलग करना है l अष्टांग योग से परमात्मा के समीपस्थ होना और उसके सर्वव्यापी रूप को प्रत्यक्षीकरण करना ही योग का परम् लक्ष्य है l गीता में इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है जो व्यक्तिअपने कर्तव्य के अनुसार काम करता है और फल की इच्छा नहीं करता l वह योगी है l वास्तव में योग द्वारा हमें अपनी संकुचित धारणाओं को तोड़ना है l हमे योग से अपने को शुद्ध करना है l अपने स्वरूप को समझना ही इस शुद्ध और पवित्रता का परिणाम है l हमें समझना है कि मैं पवित्र आत्मा हूं, भौतिक शरीर नहीं l वास्तव में योग करने के लिए हमें उस सत्य को जानना समझना है कि मेरा स्वरूप भौतिक नहीं है l योग में इंद्रियों को संयम मे रखना जरूरी है l जब इंद्रियां काबू में आ जाती है तो मन भगवान के स्मरण में लग जाता है l वह शांत होकर के अध्यात्म में लग जाता है,उस व्यक्ति के लिए सुख और दुख गर्मी और ठंडक,मान -अपमान सब बराबर हो जाते हैं l मनुष्य का इस संसार में आने का सबसे प्रमुख प्रयोजन है कि प्रभु की प्राप्ति l इसके लिए ज्ञान, कर्म और उपासना तीन मार्ग बताए गए हैं l अतः हम सबको दुख की अत्यधिक निवृत्ति और आत्मिक सुख की अत्यधिक प्राप्ति के लिए योग की शरणागति परम आवश्यक है l

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