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“भारत में स्वदेशी विचारधारा के पुरोधा एवं उसकी विकास यात्रा”

“भारत में स्वदेशी विचारधारा के पुरोधा एवं उसकी विकास यात्रा”

कृष्ण कुमार छाबड़ा
पलवल-8 जून

भारत में स्वदेशी विचारधारा केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक गौरव, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्थानीय संसाधनों के सम्मान का दर्शन है। इसकी जड़ें भारतीय परंपरा में प्राचीन काल से मिलती हैं, लेकिन आधुनिक भारत में इसे संगठित रूप से विकसित करने का श्रेय अनेक महान व्यक्तित्वों को जाता है।
1. प्राचीन भारतीय चिंतन से प्रारंभ
भारतीय संस्कृति में सदियों से स्थानीय उत्पादन, कुटीर उद्योग, ग्राम-आधारित अर्थव्यवस्था और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन को महत्व दिया जाता रहा है। गांव आत्मनिर्भर इकाइयों के रूप में कार्य करते थे। कृषि, हस्तशिल्प, वस्त्र निर्माण और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर ही होती थी।
2. स्वदेशी आंदोलन के प्रारंभिक पुरोधा :
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय उद्योगों और कारीगरों को भारी क्षति पहुंची। इसके विरोध में स्वदेशी विचार ने नया रूप लिया।
राजा राममोहन राय ने भारतीय आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में योगदान दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने “स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश” का संदेश दिया।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने राष्ट्रीय चेतना को साहित्य के माध्यम से मजबूत किया।
3. बंग-भंग और संगठित स्वदेशी आंदोलन (1905)
1905 में बंग-भंग के विरोध में स्वदेशी आंदोलन ने व्यापक जनआंदोलन का रूप लिया।
इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपत राय,बिपिन चंद्र पाल
अरविंद घोष आदि नेताओं ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग का आह्वान किया।
4. महात्मा गांधी और स्वदेशी का व्यापक दर्शन
महात्मा गांधी ने स्वदेशी को केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार बनाया। गांधी जी के अनुसार—
गांव भारत की आत्मा हैं।
खादी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
स्थानीय उत्पादन और स्थानीय उपभोग को बढ़ावा मिलना चाहिए।
विदेशी निर्भरता कम करके रोजगार सृजित किया जा सकता है।
चरखा और खादी गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख प्रतीक बने। उन्होंने “ग्राम स्वराज” की अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें प्रत्येक गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो।
5. स्वतंत्रता के बाद स्वदेशी चिंतन
स्वतंत्रता के बाद भी अनेक विचारकों ने स्वदेशी की अवधारणा को आगे बढ़ाया।
दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के माध्यम से भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकास मॉडल प्रस्तुत किया। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने स्वदेशी आधारित आर्थिक नीतियों का समर्थन किया।स्वदेशी जागरण मंच ने वैश्वीकरण के दौर में स्वदेशी उद्योग, कृषि और रोजगार की रक्षा का अभियान चलाया। 6.शहीद गेनू : स्वदेशी आंदोलन के अमर बलिदानी
शहीद गेनू (पूरा नाम: गेनू सैद या गेनू कृष्णाजी सैद) भारत के स्वदेशी आंदोलन के उन अमर सेनानियों में से एक थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं के विरोध में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
विदेशी सामान के विरोध का आंदोलन
1930 के दशक में महात्मा गांधी के नेतृत्व में विदेशी कपड़ों और वस्तुओं के बहिष्कार का अभियान पूरे देश में चल रहा था। भारतीय जनता से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और ब्रिटिश सामान के बहिष्कार का आह्वान किया जा रहा था।
12 दिसंबर 1930 को मुंबई में विदेशी कपड़े लेकर जा रहे एक ट्रक को रोकने के लिए गेनू सड़क पर खड़े हो गए। उन्होंने ट्रक चालक से विदेशी माल न ले जाने की अपील की। जब ट्रक नहीं रुका तो गेनू उसके सामने लेट गए।
कहा जाता है कि ब्रिटिश अधिकारियों के दबाव में ट्रक आगे बढ़ा और गेनू उसके नीचे आ गए। इस घटना में उनकी मृत्यु हो गई। विदेशी वस्तुओं के विरोध में दिया गया उनका यह पहला बलिदान पूरे देश में चर्चा का विषय बना और स्वदेशी आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।शहीद गेनू का संदेश
स्वदेशी वस्तुओं का सम्मान,
आर्थिक आत्मनिर्भरता का समर्थन,राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करना था।विदेशी शोषण के विरुद्ध संघर्ष।इतिहास में स्थान शहीद गेनू का बलिदान इस बात का प्रतीक है कि भारत की स्वतंत्रता केवल बड़े नेताओं के प्रयासों से नहीं बल्कि हजारों साधारण देशभक्तों के त्याग और संघर्ष से प्राप्त हुई। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रचार में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
7.. दत्तोपंत ठेंगड़ी का योगदान: 1991 में भारत में आये आर्थिक संकट को देखते हुए श्रीमान दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। स्वदेशी जागरण मंच के गठन का उद्देश्य निश्चित ही भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना था। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने का संदेश दिया। स्थानीय स्तर पर उत्पात पैदा करने तथा अपनी जरूरतों को पूरा करने पर जोर दिया। स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार ही नहीं है बल्कि स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देना है।
आत्मनिर्भर भारत का निर्माण
जैविक एवं प्राकृतिक खेती
लघु, कुटीर और सूक्ष्म उद्योगों का विकास,रोजगार सृजन
पर्यावरण संरक्षण,भारतीय ज्ञान परंपरा का सम्मान जैसे अभियानों से जुड़ गया है।
स्वदेशी विचारधारा की यात्रा प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन से प्रारंभ होकर स्वामी दयानंद, तिलक, लाला लाजपत राय, अरविंद घोष और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों से होते हुए आज आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा तक पहुंची है। स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता,कुटुम प्रबोधन, और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का आधार है। भारत के सतत और समावेशी विकास के लिए स्वदेशी विचारधारा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के समय थी।
8.स्वदेशी जागरण मंच के वर्तमान समय में प्रमुख चिंतक: स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय मुख्य संगठक श्रीमान कश्मीरी लाल जी व सह संगठक श्रीमान सतीश जी का नाम आता है जिन्होंने अपना पूरा जीवन स्वराष्ट्र हित में तथा स्वदेशी विचारधारा को देश के कोने कोने तक फैलाने में लगा दिया और अभी भी तन्मयता से काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय संयोजक के रूप में श्रीमान आर.सुन्दरम का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। वैसे स्वदेशी जागरण मंच में चिंतको की कमी नहीं है राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर के अनेक विद्वान अथक रूप से स्वदेशी विचार धारा को जन जन तक पहुंचा रहे हैं।

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