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राजस्थानी भासा दिवस पर लोगों ने कहा कि 23 वर्ष से है प्रतिक्षा, राजस्थानी भाषा को कब मिलेगी मान्यता?

राजस्थानी भासा दिवस पर लोगों ने कहा कि 23 वर्ष से है प्रतिक्षा, राजस्थानी भाषा को कब मिलेगी मान्यता?

संवाददाता:-
हर्षल रावल सिरोही/राज.


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सिरोही। राजस्थान विधानसभा ने वर्ष 2003 में सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। लेकिन 2 दशक बीत गए, लेकिन राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिली। 21 फरवरी राजस्थानी मातृभाषा दिवस के दिन आज फिर याद आ गई अपनी पुरानी मांग।
मिश्री सी मिठास घोलती राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित होने की प्रतिक्षा है। प्रदेशवासी उस दिन की प्रतिक्षा कर रहे हैं, जब लोकसभा और विधानसभा में सांसद-विधायक राजस्थानी भाषा में शपथ लेंगे। गर्व के साथ राजस्थानी भाषा बोल सकेंगे। हालांकि इस बार विधानसभा में युवा विधायकों ने प्रयास तो किया, लेकिन मान्यता नहीं होने से वे राजस्थानी में शपथ नहीं ले पाए। दूसरी ओर डिजिटल युग में जहां गूगल भी राजस्थानी भाषा को प्लेटफॉर्म दे रहा है, वहीं संसद में मान्यता का प्रस्ताव पारित नहीं हो रहा है। राजस्थानी मातृभाषा दिवस के दिन आज फिर याद आ गई अपनी पुरानी मांग।


राजस्थानी मातृभाषा दिवस के अवसर पर राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ गई है। दशकों से जारी इस संघर्ष के बीच अब डिजिटल दुनिया से भी राजस्थानी को पहचान मिलने लगी है। तकनीकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी गूगल की ओर से राजस्थानी भाषा को अपने प्लेटफॉर्म पर पहचान दिए जाने से भाषा प्रेमियों में नई आशा जगी है।

अब और नहीं हो विलम्ब:-
भाषा आंदोलन से जुड़े संगठनों एवं सोशल वर्कर का कहना है कि जब वैश्विक स्तर पर तकनीकी मंच राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, तो संविधान में इसकी मान्यता अब और अधिक विलंबित नहीं होनी चाहिए।

2003 का प्रस्ताव, आज भी निर्णय की प्रतीक्षा:-
वर्ष 2003 में राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। लेकिन दो दशक बाद भी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को स्थान नहीं मिल सका है। वर्तमान में अनुसूची में 22 भाषाएं सम्मिलित हैं, जबकि राजस्थानी करोड़ों लोगों की मातृभाषा होने के बावजूद सूची से बाहर है।

शिक्षा, शोध और साहित्य में मजबूत आधार:-
राजस्थानी भाषा केवल बोल-चाल तक सीमित नहीं है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी विषय में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी स्तर तक पढ़ाई होती है। देश की प्रतिष्ठित संस्था साहित्य अकादमी ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी है और नियमित रूप से साहित्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।

*राजस्थानी भाषा को सम्मान न मिलना, यह राजस्थानीयों का अपमान है:-
राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना, यह राजस्थानीयों का मायड़ का अपमान हैं। अन्य राज्यों की अपनी भाषा है तो राजस्थानियों की अपनी प्राचीन भाषा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त क्यों नहीं? राजस्थानी भाषी जनता और विभिन्न संस्थाएं पिछले कई दशकों से संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रही हैं, और इसे अपनी मातृभाषा को सम्मान दिलाने की लड़ाई मानती हैं।
(हर्षल रावल, पत्रकार (सत्यार्थ न्यूज)

अब देरी नहीं होनी चाहिए:-
जब भाषा में डिग्रियां दी जा रही हैं, साहित्यिक संस्थाएं मान्यता दे चुकी हैं और डिजिटल मंच जैसे गूगल इसे स्वीकार कर रहे हैं, तो संविधान में राजस्थानी भाषा को स्थान देने में देरी क्यों।
(गणपत भंवराणी, पूनियों का तला)

मायड़ भाषा रो मान जरूरी:-
मायड़ भाषा का मान अब बढ़ना आवश्यक है। पूरे विश्व में करीब चौदह करोड़ लोग राजस्थानी भाषा बोल रहे हैं। नई पीढ़ी भी राजस्थानी में रुचि ले रही हैं, तो फिर इसको मान्यता मिलनी चाहिए।
(देवीसिंह राठौड़, शिक्षाविद)

पड़ोसी राज्यों और देश में भी बोली जाती :-
राजस्थानी भाषा हमारे प्रदेश के अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी मिश्रित बोली के रूप में बोली जाती है। वहीं, पाकिस्तान के सिंध और पंजाब में भी चलन है।

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