एरन: गुप्तकालीन वैभव का जीवंत साक्षी, जहाँ सती प्रथा का पहला लिखित प्रमाण आज भी बोलता है

सागर, 28 दिसंबर 2025 (विशेष संवाददाता): मध्य प्रदेश के सागर जिले में बसे एक छोटे से कस्बे एरन में छिपा है प्राचीन भारत का अनमोल खजाना। बिना नदी के किनारे स्थित यह ऐतिहासिक नगर बुंदेलखंड और मालवा की सीमा पर खड़ा होकर गुप्त साम्राज्य (पांचवीं-छठी शताब्दी) की कला, वास्तुकला और सामाजिक रीति-रिवाजों की गहरी झलक देता है। यहाँ के विशाल वराह और गरुड़ स्तंभ, मंदिरों के अवशेष और सिक्कों का विशाल भंडार न केवल पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि भारतीय इतिहास की उन अनकही कहानियों को उजागर करता है जो सदियों से धूल में दबी हुई थीं। हालांकि, पर्यटन सुविधाओं की कमी के कारण यह स्थल अभी भी अपेक्षाकृत अज्ञात बना हुआ है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ते शोध और डिजिटल माध्यमों से इसकी पहचान मजबूत हो रही है।

एरन को प्राचीन ग्रंथों, सिक्कों और शिलालेखों में ‘एरिकिना’ (Erakina), ‘एरिकण्य’ (Erakanya), ‘एयरकिना’ (Airikina) या ‘एरिकिना’ (Erikina) के नाम से जाना जाता था। इसका नाम संभवतः स्थानीय ‘एरका’ (Typha elephantina) नामक घास से लिया गया है, जो इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी। बौद्ध और हिंदू ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है, और यह गुप्त साम्राज्य का एक प्रमुख प्रशासनिक प्रभाग ‘एरिकिना प्रदेश’ या ‘एयरकिना विषय’ की राजधानी था। पुरातात्विक खुदाई से पता चलता है कि यहाँ की सभ्यता चालकोलिथिक काल (1800 ई.पू. से 700 ई.पू.) से लेकर मध्यकाल (16वीं-18वीं शताब्दी) तक फैली हुई थी। एरन प्राचीन भारत के प्रमुख टकसालों (मिंट्स) में से एक था, जहाँ विभिन्न राजवंशों—जैसे शक, गुप्त, हूण—के सिक्के ढाले जाते थे। खुदाई में 3,000 से अधिक सिक्के मिले हैं, जिनमें 300 ई.पू. से 100 ई. तक के नमूने शामिल हैं। इन सिक्कों पर लक्ष्मी, हाथी, घोड़े, बौद्ध प्रतीक (धर्मचक्र, त्रिरत्न) और स्वस्तिक जैसे चित्र अंकित हैं, जो प्राचीन अर्थव्यवस्था और धार्मिक प्रभाव को दर्शाते हैं।

सती प्रथा का प्रथम प्रमाण: भानुगुप्त के अभिलेख से खुलासा
एरन का ऐतिहासिक महत्व तब चरम पर पहुँच जाता है जब बात सती प्रथा की आती है। 510 ईस्वी के भानुगुप्त के प्रसिद्ध एरन अभिलेख से गोपराज नामक सेनापति की पत्नी के सती होने का पहला लिखित प्रमाण मिलता है। यह शिलालेख श्रिधरवरमन के स्तंभ के उल्टे भाग पर उत्कीर्ण है, जिसमें वर्णन है कि गोपराज युद्ध में मारे गए, तो उनकी पत्नी ने स्वयं को उनके चिता पर भस्म कर लिया। पुरातत्वविदों के अनुसार, यह प्रथा का सबसे प्राचीन एपिग्राफिकल साक्ष्य है।f626ef इसके अलावा, बाद के काल के सती स्तंभ भी मिले हैं—जैसे 1304 ई., 1664 ई. और 1774 ई. के—जो सामाजिक परिवर्तनों की गवाही देते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यह अभिलेख न केवल धार्मिक रीति बल्कि गुप्तकालीन समाज की स्त्री स्थिति को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
गुप्तकालीन कला और वास्तुकला का अनुपम उदाहरण

गुप्त काल को भारतीय कला का स्वर्ण युग कहा जाता है, और एरन इसके जीवंत प्रमाण के रूप में उभरता है। यहाँ ईंटों और पत्थरों से बने मंदिरों के अवशेष हैं, जो शहर के पश्चिमी भाग में पूर्व की ओर 76 डिग्री के कोण पर संरेखित हैं। इनमें विष्णु और उनके अवतारों की मूर्तियाँ प्रमुख हैं। एरन की खुदाई से मिले शिलालेखों में समुद्रगुप्त (336-380 ई.), बुद्धगुप्त (484-485 ई.) और तोरामण (लगभग 500 ई.) के अभिलेख शामिल हैं। बुद्धगुप्त का वैष्णव शिलालेख कलिंदी (यमुना) से नर्मदा तक के गुप्त क्षेत्र का वर्णन करता है, जबकि तोरामण का अभिलेख वराह मूर्ति के सीने पर उत्कीर्ण है, जो हूण शासक के प्रभाव को दर्शाता है।
प्रमुख आकर्षण: वराह और गरुड़ के चमत्कार
एरन के आकर्षणों में सबसे प्रमुख है वराह मूर्ति। यह विशालकाय वराह (सूअर अवतार) स्तंभ 13.83 फुट लंबा, 11.17 फुट ऊँचा और 5.125 फुट चौड़ा है, जो विष्णु के थेरियोमॉर्फिक (पशु-रूप) रूप को दर्शाता है। मूर्ति पर पृथ्वी को दांत से बचाते हुए वराह का चित्रण है, जिसमें ऋषि-मुनि भुजाओं पर अंकित हैं, सरस्वती जीभ पर विराजमान हैं, और कान में आकाशीय संगीतकार। मूर्ति के चारों ओर 28 गोलाकार पट्टिकाएँ हैं, जो पांचवीं शताब्दी के तारों से मेल खाती हैं। इसके नीचे विष्णु की मानवाकार मूर्ति के खंडहर हैं, और प्रवेश द्वार पर एक अपठित शेल लिपि का पत्थर है। यह मंदिर धन्यविष्णु द्वारा बनवाया गया था।
दूसरा चमत्कार है गरुड़ स्तंभ, जो 47 फुट (कुछ स्रोतों में 43 फुट) ऊँचा है और भारत का सबसे लंबा एकल स्तंभ माना जाता है। 484/485 ई. में समर्पित यह स्तंभ 13 फुट के वर्गाकार चबूतरे पर खड़ा है, जिसमें वर्गाकार आधार, अष्टकोणीय भाग, घंटी आकार का शिखर और ऊपर गरुड़ की दोहरी मूर्ति है, जो नाग को पकड़े हुए चक्र धारण किए है। अभिलेख में आषाढ़ संवत् 165 और विष्णु-जनार्दन का उल्लेख है।
अन्य आकर्षणों में सती स्तंभ शामिल है, जो भानुगुप्त के अभिलेख से जुड़ा है। मंदिर अवशेषों में विष्णु मंदिर (13.17 फुट की क्षतिग्रस्त विष्णु मूर्ति, गंगा-यमुना की नक्काशी), वामन मंदिर के खंडहर, नरसिंह मंदिर (7 फुट की नरसिंह मूर्ति) और हनुमान मंदिर (लगभग 750 ई.) प्रमुख हैं। इनकी नक्काशीदार दरवाजे, स्तंभ और दैनिक जीवन के दृश्य गुप्त कला की बारीकी को उजागर करते हैं। पास के पुरातत्व संग्रहालय में ये मूर्तियाँ और अन्य वस्तुएँ संरक्षित हैं, जहाँ 3,000 से अधिक सिक्कों का संग्रह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
स्थिति और पहुँच: विकास की प्रतीक्षा में एक छिपा रत्न
एरन सागर जिले में स्थित है, जो बुंदेलखंड को मालवा से जोड़ने वाला प्राचीन मार्ग था। वास्तव में, यह बीना नदी के दक्षिणी तट पर बसा है, जो इसे एक प्राकृतिक ‘U’ आकार में घेरती है, और दक्षिण में जंगली पहाड़ियाँ इसे और रहस्यमय बनाती हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन मंडी बामोरा है, जबकि सागर शहर से सड़क मार्ग से पहुँचना आसान है—लगभग 80 किमी दूर। हालांकि, रुकने की व्यवस्था, साइनेज और गाइड की कमी पर्यटकों को निराश करती है। स्थानीय इतिहासकारों ने सड़क सुधार और होमस्टे की मांग की है। भोपाल से 160 किमी और विदिशा से 100 किमी दूर, यह स्थल सanchi-उदयगिरि जैसे स्थलों के साथ एक सर्किट का हिस्सा बन सकता है।
निष्कर्ष: विकास की बुनियाद पर खड़ा इतिहास
एरन भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति का अनूठा संगम है, जो गुप्तकाल के वैभव को जीवंत करता है। यहाँ सती प्रथा से लेकर मुद्रांकन तक हर तथ्य प्राचीन भारत की जटिलताओं को उजागर करता है। लेकिन इसे पूर्ण विकसित पर्यटन स्थल बनाने के लिए सरकारी प्रयासों की आवश्यकता है—बेहतर सड़कें, संग्रहालय विस्तार और डिजिटल गाइड। जैसे-जैसे शोध बढ़ रहा है, एरन न केवल इतिहासकारों बल्कि सामान्य पर्यटकों के लिए भी एक अनिवार्य गंतव्य बन सकता है। क्या मध्य प्रदेश सरकार इस छिपे रत्न को चमकाने का संकल्प लेगी? समय ही बताएगा।
















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