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करीला धाम: माता जानकी एवं लव-कुश की पावन जन्मभूमि पर रंग पंचमी का भव्य मेला

करीला धाम: माता जानकी एवं लव-कुश की पावन जन्मभूमि पर रंग पंचमी का भव्य मेला

एक दिन के इस मेले में 25 से 30 लाख भक्तों का आवागमन होता है

एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उत्सव
हरिशंकर पाराशर
अशोकनगर (मुंगावली) मध्य प्रदेश – (दिनांक: 5 मार्च 2026)
रामायण काल की त्रेता युगीन स्मृतियों से जुड़ी मध्य प्रदेश की यह पावन भूमि आज भी भक्तों के हृदय में राम-सीता की कथा को जीवंत रखती है। आशोकनगर जिले की मुंगावली तहसील में स्थित करीला धाम मंदिर, जहां माता जानकी (सीता) ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश को जन्म दिया, हर वर्ष रंग पंचमी पर एक भव्य तीन दिवसीय मेले का साक्षी बनता है। यह मेला, जिसे ‘करीला मेला’ या ‘रंग पंचमी महोत्सव’ कहा जाता है, लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है और बुंदेलखंड की लोक परंपराओं का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है।
करीला धाम का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
करीला धाम आशोकनगर से लगभग 35-40 किमी दूर कानीखेड़ी गांव में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। रामायण के अनुसार, वनवास के दौरान माता सीता यहां पहुंचीं और वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ। मंदिर में माता जानकी की मुख्य प्रतिमा के साथ भगवान राम, लक्ष्मण और महर्षि वाल्मीकि की मूर्तियां स्थापित हैं। पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो भक्तों की श्रद्धा का प्रतीक हैं।
यह धाम लगभग 120 वर्ष पूर्व दीपनाखेड़ा के महंत द्वारा खोजा गया माना जाता है। यहां एक चमत्कारी गुफा भी है, जो साल में एक बार खुलती है और जहां जला हुआ दीपक मिलता है, जो भक्तों को आश्चर्यचकित करता है। मेला बुंदेलखंड क्षेत्र की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है, जो 200 वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है।
रंग पंचमी मेला: तिथि, अवधि एवं विशेषताएं
रंग पंचमी (फाल्गुन शुक्ल पंचमी) को होली का अंतिम चरण माना जाता है, लेकिन करीला धाम में यह लव-कुश के जन्म का उत्सव भी है। 2026 में यह मेला 8 मार्च से शुरू होकर तीन दिनों तक चलेगा। पिछले वर्षों में (जैसे 2025 में 18-20 मार्च) लाखों (20-30 लाख तक) भक्त पहुंचे। इस बार भी प्रशासन ने महाकुंभ जैसी तैयारियां की हैं – 100 सीसीटीवी कैमरे, 1700 पुलिसकर्मी, महिला पंडाल, अलग सेक्टर और प्लास्टिक मुक्त अभियान।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल के वर्षों में दर्शन किए, जहां एक बार सीढ़ी टूटने की घटना भी हुई। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक द्वारा तैयारियां जायजा ली जाती हैं, जिसमें बस किराया निर्धारण (अशोकनगर से 50 रुपये) और वाहन व्यवस्था शामिल है।
मेले की जीवंत छटा एवं सांस्कृतिक आकर्षण
मेला 30 एकड़ क्षेत्र में फैलता है। पहाड़ी के चारों ओर सैकड़ों स्टॉल लगते हैं, जहां पारंपरिक व्यंजन, खिलौने, बर्तन, आध्यात्मिक सामग्री और चमत्कारी कड़ाही (कम तेल में खाना पकने की मान्यता वाली) बिकती है। झूले, फेरिस व्हील, रामलीला, भजन-कीर्तन, कठपुतली शो और लोक नृत्य आयोजित होते हैं।
सबसे प्रमुख आकर्षण है राई नृत्य (बधाई नृत्य या लव-कुश बधाई राई)। मन्नत पूरी होने पर महिलाएं (कभी-कभी 2000 तक) रंग-बिरंगे लहंगे, घुंघरू, चूड़ियां और आभूषणों से सजकर समूह में तेज गति से नाचती हैं। ड्रम-नगाड़ों की थाप पर रंग उड़ाते हुए वे माता जानकी की आराधना करती हैं। यह बुंदेली लोक परंपरा है, जो संतान प्राप्ति, सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी है।
रात में मंदिर परिसर में आरती और दीपोत्सव की छटा अद्भुत होती है। भक्त दूध, फल, चंदन चढ़ाते हैं और ‘राई’ का वितरण करते हैं।
आस्था, परंपरा एवं सामाजिक महत्व
भक्त यहां संतान प्राप्ति, पारिवारिक सुख और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। मेला विभिन्न जाति-धर्म के लोगों को एकजुट करता है। पर्यटन विभाग द्वारा प्रोत्साहित यह आयोजन मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर है।
निष्कर्ष: भक्ति का अनंत सागर
करीला धाम का रंग पंचमी मेला आस्था, संस्कृति और उत्सव का अनुपम मेल है। यह त्रेता युग की याद दिलाता है और माता जानकी की कृपा का स्रोत बना रहता है। यदि आप रामायण की जीवंत कथा और बुंदेली लोक नृत्य का अनुभव चाहते हैं, तो अगले रंग पंचमी पर अवश्य पधारें।

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