पैसे के लोभी वन विभाग वालो ने अतिक्रमण से मुक्त वन भूमि को हवाले कर दिया वन माफियाओं के मूक दर्शक बने बड़े वन अधिकारी
बस्तगुआ भटगोरा और चदेरा में अतिक्रमण मुक्त वन भूमि पर दिन रात हो रही जुताई

जतारा में पीरपानी बीट अंतर्गत नाक के नीचे वन गए वन विभाग के कर्मचारियों और छुट् पुट नेता भईया लोगों के पक्के मकान और बाउंड्रीवाल
टीकमगढ़ म प्र से कविन्द पटैरिया पत्रकार की रिपोर्ट
विदित हो कि कभी वन विभाग जतारा के बुलडोजर से आम आदमी के साथ वन माफियाओं में एक डर रहता था लेकिन जतारा वन विभाग के वन कर्मचारी वन माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के साथ मिलकर और पैसे लेकर वन भूमि पर अवैध उत्खनन और अतिक्रमण और बिना टीपी के अवैध रूप से लकड़ी परिवहन कराने की दुकान खोल लिए जिसकी पूरी जानकारी टीकमगढ़ जिले और छतरपुर वृत्त के अधिकरियों को भी है लेकिन सभी के सभी वन अधिकारी मूक और तमाशबीन बने हुए हैं जिसके पीछे का कारण केवल एक ही है और वो है वन संपदा की खुली लूट करवाकर अपनी अपनी तिजोरी भरने की चाहत जिसमें चौकीदार से लेकर सभी बड़े अधिकारी शामिल हैं।
वन भूमि पर अवैध उत्खनन और अवैध कब्जा के लिए पूरा श्रेय ऊपर बैठे अधिकारियों को जाता है,जिसमें स्थानीय वन अमला भी शामिल हैं। जो मिलकर केवल और केवल शासन के पैसे को बंदरबाट करने में लगे हुए हैं। पर्यावरणविद एवं जानकारों की माने तो वर्तमान में वन मंडल टीकमगढ़ और वन वृत्त छतरपुर के अधिकारियों और उनके मातहतों को वन सुरक्षा से कोई लेना देना नहीं इन सभी का सीधा एक ही उद्देश्य और टारगेट है कि बुंदेलखंड को कैसे लूटा जाए?और यहां होने वाले वानिकी और निर्माण कार्यों में मजदूरों की जगह मशीनों का उपयोग करके स्थानीय मजदूर जनता को दूसरे प्रदेशों में पलायन करने को कैसे मजबूर किया जाए? आये दिन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बुंदेलखंड खासतौर पर टीकमगढ़ क्षेत्र की स्थानीय ग्रामीणों के पलायन की खबरें किसी से छुपी नहीं हैं। चाहे वो पलायन किसी भी विभाग की निष्क्रियता से हो रहा हो उससे शासन को कोई लेना देना नहीं है। विश्वशनीय सूत्रों की माने तो वन वृत्त छतरपुर के सीसीएफ छतरपुर, वन मंडल अधिकारी टीकमगढ़ एवं उपवमनंडल अधिकारी टीकमगढ़ स्वयं मध्यप्रदेश और स्थानीय टीकमगढ़ के न होकर अलग अलग जगह से आते हैं तो इनको यहाँ के कल्चर और लोगो की समस्याओं से क्या लेना देना होगा ये तो उनकी कार्यशैली से उनको ही पता होगा। वन विभाग के इन अधिकारियों का केवल एक ही सूत्रीय कार्यक्रम है बुंदेलखंड को लूटकर खा जाओ और जो बाद में जांच या जो भी कार्यवाही बैठे वो स्थानीय अधीनस्थ छोटे स्टॉफ की झोली में नए वन अपराध को हमेशा की तरह बचने के लिए पुराना बताकर डाल दिया जाता है और अधिनस्थों पर कार्यवाही करके बड़े वन अधिकारियों द्वारा वाहवाही लूट ली जाती है।
वन विभाग जतारा अंतर्गत बस्तगुआ, भट्गोरा, मगरई, चंदेरा में विगत वर्षों में वन भूमि से अतिक्रमण हटाकर हजारों एकड़ वन भूमि को सुरक्षित किया गया था उस वेश कीमती वन भूमि को फिर से वन माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के द्वारा सामूहिक रूप से संगठित होकर वन अमले की मदद से फिर अतिक्रमण कर लिया गया है लेकिन उसके विरुद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं हो रही है जबकि सैकड़ों एकड़ उस वन भूमि को वन अमले ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुक्त कराया था इसके साथ ही वन अपराधों में जप्त किए गए वाहनों को राजसात की कार्यवाही से बड़े अधिकारियों द्वारा पैसा लेकर निर्मुक्त कर दिया जा रहा है इनमें से तो कुछ वाहन ऐसे भी है जिनको वन अपराधों मे जप्त किया गया था लेकिन किसी भी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा (डीएफओ, एसडीओ और रेंजर के द्वारा) न्यायालय में शासन का पक्ष जानबूझकर न रखने और न्यायालय में उपस्थित न होने के कारण अपराधियों से सांठ गांठ करके नियम विरुद्ध तरीके से सुपुर्दगी में दिलाया जा रहा है। टीकमगढ़ वन विभाग की इस प्रकार की कार्य शैली से निश्चित रूप से ही वन माफियाओं के हौसले बुलंद हो रहे हैं जिसकी आड़ में बड़े अधिकारियों के साथ स्थानीय वन विभाग के वनरक्षक, डिप्टी ,और कुछ जनप्रतिनिधि भी बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं चूक रहे हैं जिनके द्वारा रातों रात वन परिक्षेत्र जतारा की बीट पीरपानी की वन भूमि पर बेजा कब्जा करके पक्का निर्माण कर लिया गया है और शासन प्रशासन हाथों पर हाथ रखकर कत्थक करने को मजबूर है और होगा ही क्यों नहीं क्योंकि जब सैयाँ हुए कोतबाल तो डर काहे का? जिसके तहत स्वयं वन विभाग में पदस्थ स्टॉफ के द्वारा वन भूमि पर पक्के मकान और बाउंड्रीवाल का निर्माण कर लिया गया है जिसके संबंध में सभी अधिकारी जानकार भी बेखबर बने हुए हैं लेकिन कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।अगर प्रसारित खबर को कोई भी जांच एजेंसी या सरकार संज्ञान लेगी तो निश्चित ही वन विभाग के भ्रष्टाचार की पोल उजागर हो जाएगी लेकिन जिस प्रकार से सिस्टम चल रहा है उसमें सरकारी लोगों और सरकार का दोष नहीं है।
आजकल टीकमगढ़ जिले के लोगों द्वारा वन विभाग को मन विभाग कहकर बुलाया जा रहा है जिससे स्पष्ट होता है कि वन विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर है। अकेला वन मंडल टीकमगढ़ जतारा वन विभाग अवैध उत्खनन और अतिक्रमण से प्रभावित नहीं है बल्देवगढ़ रेंज और टीकमगढ़ रेंज की अनेकों बीटों की वन भूमि में अवैध उत्खनन और अतिक्रमण का काम जोरों से चल रहा है दिगोडा , मोहनगढ़ एवं बड़ागांव के जंगलों में अनेकों पक्के निर्माण और पूरी वन भूमि पर उत्खनन और अतिक्रमण हो रहा है जिसकी फिकर न तो छतरपुर के सीसीएफ को है और न ही टीकमगढ़ के डीएफओ और एसडीओ को है। वन भ्रमण और बीट निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है मासिक रोस्टर के अनुसार होने वाले बीट निरीक्षण में वन भूमि पर व्याप्त अतिक्रमण और उत्खनन को किसी भी अधिकारी के द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है। वन मंडल टीकमगढ़ का संपूर्ण वन अमला वरिष्ठ अधिकारियों को परसेंटेज देकर चैन से अपने घरों में सो रहा है। अगर ऐसा ही हाल रहा तो एक दिन टीकमगढ़ जिले की सम्पूर्ण वन भूमि माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के कब्जे में होकर बीरान हो जाएगी।















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