राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय: पत्रकारिता की साख और स्वतंत्रता के लिए एक क्रांतिकारी कदम
सभी प्रदेशों को सशक्त करने वाला संघीय मॉडल, छत्तीसगढ़ से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुधार की माँग
हरिशंकर पाराशर

पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज विश्वसनीयता और सुरक्षा के संकट से जूझ रही है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों और उनकी साख पर उठते सवालों ने एक बार फिर इस पेशे के भविष्य पर बहस छेड़ दी है। इस संदर्भ में विशेषज्ञों और पत्रकारों ने पूरे देश में एक राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय (Self-Regulating Journalists Body) की स्थापना की माँग उठाई है, जो सभी प्रदेशों को प्रतिनिधित्व और अधिकार दे। यह निकाय न केवल पत्रकारों की सुरक्षा और नैतिकता को मजबूत करेगा, बल्कि स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर लाकर पत्रकारिता को नई दिशा देगा।
वर्तमान परिदृश्य: पत्रकारिता पर संकट
हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर हमले की घटनाएँ सुर्खियों में रही हैं। बस्तर में पत्रकार की हत्या और शव को सेप्टिक टैंक में फेंकने से लेकर हालिया वायरल वीडियो, जिसमें एक अधिकारी ने पत्रकार का कॉलर पकड़कर अपमानित किया, ने इस पेशे की असुरक्षा को उजागर किया है। दूसरी ओर, कुछ पत्रकारों द्वारा वसूली और एजेंडा-आधारित पत्रकारिता ने जनता के बीच इस पेशे की विश्वसनीयता को कम किया है। आज स्थिति यह है कि “मैं पत्रकार हूँ” कहने पर लोग पूछते हैं, “कौन-सी पार्टी के हो?”
वर्तमान में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) प्रिंट मीडिया के लिए और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए स्व-नियमन की जिम्मेदारी निभाते हैं। डिजिटल मीडिया के लिए 2021 के आईटी नियमों के तहत PADMA और DIGIPUB जैसे निकाय हैं, लेकिन ये क्षेत्रीय और माध्यम-विशिष्ट हैं। इनकी सीमाएँ स्पष्ट हैं—PCI की शक्तियाँ सीमित हैं, NBDSA केवल प्रसारण तक केंद्रित है, और डिजिटल निकाय सरकारी हस्तक्षेप के दायरे में हैं। परिणामस्वरूप, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पत्रकारों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर अनदेखे रह जाते हैं।
राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय: क्यों जरूरी?
पत्रकारिता राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है, लेकिन भारत की क्षेत्रीय विविधता—भाषा, संस्कृति और स्थानीय मुद्दों—को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय सभी प्रदेशों को प्रतिनिधित्व देगा, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करेगा। यह निकाय फेक न्यूज, ब्लैकमेलिंग और पत्रकारों पर हमलों जैसे मुद्दों से निपटेगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि 2006 के ड्राफ्ट ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज रेगुलेशन बिल की तर्ज पर एक नया एक्ट लाया जाए, जो स्व-नियमन को वैधानिक आधार दे, लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता को बनाए रखे।
संघीय मॉडल: सभी प्रदेशों को सशक्तिकरण
प्रस्तावित राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय की संरचना इस प्रकार हो सकती है:
केंद्रीय बोर्ड: इसमें 50% पत्रकार और संपादक, 30% प्रत्येक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश से एक-एक प्रतिनिधि, और 20% कानून व नैतिकता के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हों।
प्रदेश इकाइयाँ: प्रत्येक राज्य में स्वायत्त क्षेत्रीय समितियाँ होंगी, जो स्थानीय शिकायतों (जैसे छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में में पत्रकारों पर हमले) को संभालेंगी और राष्ट्रीय बोर्ड को रिपोर्ट करेंगी।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया: सदस्यों का चयन पत्रकार संगठनों द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से होगा, ताकि कॉर्पोरेट या राजनीतिक प्रभाव से बचा जा सके।
उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में मौजूद छोटे पत्रकार संगठनों को इस राष्ट्रीय ढाँचे में एकीकृत किया जा सकता है।
निकाय की जिम्मेदारियाँ
राष्ट्रीय स्तर पर: पत्रकार की परिभाषा तय करना, आधुनिक चुनौतियों (जैसे AI-जनरेटेड फेक न्यूज) के लिए नैतिक संहिता को अपडेट करना, और प्रिंट-डिजिटल जैसे अंतर-माध्यम शिकायतों का निपटारा करना।
*प्रदेश स्तर पर: स्थानीय अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार की जाँच, दोषी अधिकारियों के खिलाफ ट्रांसफर या FIR की सिफारिश, और पत्रकारों के लिए “मर्यादा और अधिकार” पर कार्यशालाएँ आयोजित करना।
तीन-स्तरीय तंत्र: स्व-पत्रकार निवारण, प्रदेश समिति और राष्ट्रीय ओवरसाइट, जो 2021 के आईटी नियमों से प्रेरित हो, लेकिन अधिक स्वायत्त हो।
प्रशिक्षण: राष्ट्रीय सेमिनारों और प्रदेश-विशेष कार्यशालाओं में लॉ ग्रेजुएट, समाजशास्त्रियों और पत्रकारों को शामिल करना।
चुनौतियाँ और समाधान
चुनौती 1: सरकारी हस्तक्षेप
2021 के आईटी नियमों में सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) की भूमिका स्व-नियमन की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है। समाधान: निकाय को PCI की तरह वैधानिक लेकिन स्वायत्त बनाया जाए, जिसमें न्यायिक समीक्षा का प्रावधान हो।
**चुनौती 2: कॉर्पोरेट प्रभाव
बड़े मीडिया हाउस स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों को हाशिए पर धकेलते हैं।*
समाधान: निकाय में स्वतंत्र पत्रकारों को आरक्षण और पारदर्शी फंडिंग (सदस्यता शुल्क से) सुनिश्चित की जाए।
*चुनौती 3: डिजिटल पत्रकारिता
सोशल मीडिया पत्रकारिता को मौजूदा निकाय पूरी तरह कवर नहीं करते।
समाधान: डिजिटल कोड (जैसे ASCI) को एकीकृत कर सोशल मीडिया पत्रकारिता को शामिल किया जाए।
लाभ: पत्रकारिता और लोकतंत्र का सशक्तिकरण
सुरक्षा: पत्रकारों पर हमलों की राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और नीतिगत बदलाव।
विश्वसनीयता: निष्पक्षता और नैतिकता से जनता का भरोसा बढ़ेगा, जिससे “पार्टी का पत्रकार” जैसे सवाल कम होंगे।
संघीय ढाँचा: ब्लॉक ग्राम लेवल जैसे राज्यों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा बनेंगे।
वैश्विक प्रेरणा: OSCE जैसे अंतरराष्ट्रीय मॉडल दिखाते हैं कि स्व-नियमन पत्रकारिता की स्वतंत्रता को मजबूत करता है।
निष्कर्ष: सत्य की कलम को नई ताकत
राष्ट्रीय स्व-नियमन निकाय की स्थापना पत्रकारिता को सत्ता और कॉर्पोरेट दबाव से मुक्त करेगी। यह PCI और NBDSA की सीमाओं को दूर करते हुए भारत की विविधता को एकजुट करेगा। छत्तीसगढ़ से शुरू हुई यह माँग अब राष्ट्रीय स्तर पर सुधार का आह्वान है। पत्रकारों, संगठनों और सरकार को मिलकर इस दिशा में कदम उठाना होगा, ताकि पत्रकारिता न केवल सवाल पूछने, बल्कि जवाबदेही का प्रतीक बने।
जय हिंद!
*हरिशंकर पाराशर
जर्नलिस्ट कौंसिल ऑफ़ इंडिया मध्य प्रदेश कोऑर्डिनेटर*
















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