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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र की प्राणशक्ति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र की प्राणशक्ति

पलवल-02 अक्टूबर
कृष्ण कुमार छाबड़ा

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्भव सौ वर्ष पूर्व सनातन, हिंदुत्व और भारत के सौभाग्य के रूप में हुआ। 1925 के बाद से हर विजयदशमी एक नया अध्याय जोड़ती गई और संघ विश्व का महानतम संगठन बन गया। एक शताब्दी की यह यात्रा, संघर्ष, बलिदान, समर्पण, त्याग और तप से परिपूर्ण है। असंख्य स्वयंसेवकों ने निष्काम भाव से अपने जीवन को संघ के यज्ञ में स्वयं को आहूत किया और यह राष्ट्र अनुष्ठान भारत माता के निमित्त एक शताब्दी पूर्ण होने पर भी अनवरत और अविरल जारी है। संघ एक दिव्य शक्ति के रूप में अनन्तकाल तक स्थापित, सक्रिय और सक्षम रहेगा, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, अपितु शपथ से शुद्ध सत्य है। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक इसलिए इसे ईश्वरीय कार्य मानता है। इसी भाव से ध्वज प्रणाम करते आ रहे लाखों स्वयंसेवक इस महान संगठन के प्राण हैं और सनातन उसकी आत्मा। संघ ने विचार शक्ति से राष्ट्र को नई दिशा दी है। संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने पर पूज्य सर संघ चालक मोहन राव भागवत के उद्बोधन में अतीत से लेकर भविष्य तक का पूरा विजन स्पष्ट झलकता है।
सर संघचालक डॉ. मोहन राव भागवत ने जो उद्बोधन दिया, वह न केवल इतिहास की प्रतिध्वनि है, बल्कि भविष्य की दिशा का आह्वान भी। यह भाषण, संघ की सौ वर्षों की यात्रा का सार है, जहां हिंदुत्व की रक्षा, राष्ट्र की एकता और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने की रणनीति बुनी गई है। रचनात्मक दृष्टि से देखें, तो यह भाषण एक महाकाव्य की तरह है – जहां अतीत के बलिदान नायक हैं, वर्तमान की चुनौतियां संघर्ष, और भविष्य की विजय संघ की अनिवार्य भूमिका। भारत और हिंदुत्व के लिए संघ की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि यह वह संगठन है जो सनातन मूल्यों को जीवंत रखते हुए, राष्ट्र को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है।
सर संघ चालक जी का उद्बोधन गुरु तेग बहादुर जी के 350वें बलिदान वर्ष से प्रारंभ होता है, जो हिंदुत्व की रक्षा का प्रतीक है। विदेशी आक्रमणकारियों से हिंदू समाज की चादर बनकर उन्होंने जो त्याग किया, वह संघ की मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है। महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस का उल्लेख कर भागवत जी राष्ट्रभक्ति की उस परंपरा को जोड़ते हैं, जहां सादगी, समर्पण और देशहित सर्वोपरि हैं। यह विश्लेषण दर्शाता है कि संघ हिंदुत्व को राजनीतिक सत्ता से अलग, एक सांस्कृतिक एकता के रूप में देखता है। हिंदुत्व यहां मात्र धर्म नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की उदार दृष्टि है, जो विविधताओं को विशेषताओं में बदलती है। भारत के लिए संघ की अनिवार्यता यहीं से उजागर होती है, एक ऐसा राष्ट्र जहां भाषाएं, पंथ और जातियां बहुल हैं, वहां हिंदुत्व की एकात्म भावना ही एकता की गारंटी है। बिना संघ जैसे संगठन के, यह एकता बिखर सकती है, जैसा कि इतिहास में आक्रमणों के दौरान हुआ।
भागवत जी आशा और चुनौतियों का संतुलित चित्रण करते हैं। प्रयागराज महाकुंभ का उल्लेख एक रचनात्मक रूपक की तरह है, जहाँ करोड़ों श्रद्धालुओं की एकता ने विश्व रिकॉर्ड बनाया, जो भारत की आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है। लेकिन पहलगाम हमले की चर्चा पीड़ादायक स्मृति है, जहां आतंकवादियों ने हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाया। भारत सरकार के मजबूत प्रत्युत्तर और सेना के पराक्रम की सराहना करते हुए, भागवत जी वैश्विक मित्रों की परीक्षा का उल्लेख करते हैं। स्पष्ट है कि हिंदुत्व की रक्षा में संघ की भूमिका अपरिहार्य है। नक्सलवाद पर नियंत्रण का श्रेय देते हुए, वे शोषण, अन्याय और विकास की कमी को जड़ बताते हैं। यहां संघ की अनिवार्यता उभरती है – वह समाज को संगठित कर, सरकार की कमियों को पूरित करता है। बिना संघ की सेवा भावना के, ग्रामीण भारत में न्याय और विकास का सपना अधूरा रहता।
आर्थिक मोर्चे पर, भाषण रचनात्मक रूप से वैश्विक असमानताओं को उजागर करता है। अमीर-गरीब की खाई, पर्यावरण हानि और अमानवीय संबंधों का चित्रण एक चेतावनी है। अमेरिका की टैरिफ नीति का जिक्र कर सरसंघचालक ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया है। यह भारत के लिए संघ की आवश्यकता को रेखांकित करता है – एक ऐसा संगठन जो आर्थिक स्वावलंबन को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ता है। हिंदुत्व यहां उपभोगवाद के विरुद्ध खड़ा होता है, जहां विकास भौतिक ही नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक भी है। पड़ोसी देशों – श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल – की अस्थिरता का विश्लेषण गहन है। हिंसक उथल-पुथल से सबक लेते हुए, सरसंघचालक शांतिपूर्ण सामाजिक परिवर्तन पर बल देते हैं। यह दर्शाता है कि संघ हिंदुत्व को वैश्विक शांति का माध्यम बनाता है, जहां भारत पड़ोसियों को परिवार मानता है।
उनके उद्बोधन का हृदय भाग भारतीय चिंतन है, जहां स्वामी विवेकानंद से गांधी तक के मनीषियों का उल्लेख है। आधुनिक विकास को अधूरा बताते हुए, भागवत जी सनातन दृष्टि प्रस्तुत करते हैं – जहां मनुष्य, समाज और सृष्टि का समग्र विकास होता है। यह रचनात्मक रूप से हिंदुत्व को वैश्विक समस्याओं का समाधान बनाता है। पर्यावरण संकट को चेतावनी मानकर संघ की भूमिका स्पष्ट है – वह समाज को पर्यावरण संरक्षण की ओर प्रेरित करता है। भारत और हिंदुत्व के लिए संघ की अनिवार्यता यहीं चरम पर है: बिना इसके, भारत वैश्विक नेता नहीं, मात्र अनुयायी बनेगा।
संघ का चिंतन भाग भविष्य की ब्लूप्रिंट है। शताब्दी पूर्ण होने पर, भागवत जी कहते हैं कि विकास पथ को भारतीय दृष्टि से गढ़ना होगा। स्वदेशी को पूजा से परे, सबको जोड़ने वाला धर्म बताते हुए, वे समाज परिवर्तन पर जोर देते हैं। युक्ति निर्माण से व्यवस्था परिवर्तन का सूत्र प्रभावी है – शाखाएं यहां साधना का माध्यम हैं। भविष्य में संघ की भूमिका की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा हिंदू समाज को संगठित कर, भारत को वैभवशाली बनाना है।

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