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कौशल के बल पर भारत बनेगा विकास का अग्रदूत -15 जुलाई-विश्व युवा कौशल दिवस पर विशेष

कौशल के बल पर भारत बनेगा विकास का अग्रदूत -15 जुलाई-विश्व युवा कौशल दिवस पर विशेष

पलवल-14 जुलाई
कृष्ण कुमार छाबड़ा

“ज्ञान स्वयं में शक्ति नहीं है, जब तक कि वह कार्य रूप में परिणत न हो– कौशल वही है” ज्ञान को कार्य रूप में बदलने की क्षमता ही कौशल है। जिसके पास कौशल है, वही श्रेष्ठ और अग्रणी है। दुनिया में काम करने और आगे बढ़ने के असीमित और अपरिमेय अवसर हैं, लेकिन कुशल और पेशेवर लोगों के लिए। जिन हाथों में हुनर है, उन्हें सफलता का अग्रदूत बनने से कोई नहीं रोक सकता। अब वो समय आ गया है कि युद्ध के बल पर नहीं, अपितु कौशल के दम पर दुनिया भर में सिक्का कायम किया जा सकता है। भारत में युवा शक्ति है, और यदि इन्हें उचित प्रशिक्षण, आधुनिक कौशल और अवसर दिए जाएं, तो ये न केवल देश की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं, बल्कि दुनिया की मांग को भी पूरा कर सकते हैं। भारत में स्किल की ग्लोबल सप्लाई चेन का नेतृत्वकर्ता बनने की भरपूर क्षमता है। विश्व स्तर पर तेजी से बदलते तकनीकी और औद्योगिक परिदृश्य में, कुशल मानव संसाधनों की मांग बढ़ रही है। भारत, जो दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है, वह इन अवसरों का लाभ उठा सकता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फॉर्म की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, 2030 तक वैश्विक रोज़गार बाजार में 78 मिलियन नई नौकरियां सृजित होंगी। इनमें डेटा, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में कुशल पेशेवरों की मांग सबसे अधिक होगी। पर्यावरणीय स्थिरता पर बढ़ते ध्यान के कारण, ग्रीन बिल्डिंग, नवीकरणीय ऊर्जा, और बैटरी इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में कुशल पेशेवरों की मांग बढ़ रही है। 2032 तक पर्यावरण इंजीनियरों के लिए रोज़गार में 6% की वृद्धि का अनुमान है। जो देश युवाओं को कौशल प्रदान करेगा, वह इन अवसरों का सबसे बड़ा अधिकारी होगा। वर्क फ़ोर्स में लैंगिक समानता भी लानी होगी। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, कौशल विकास और लैंगिक समानता के लिए विकासशील देशों में 420 अरब डॉलर की वार्षिक वित्तीय आवश्यकता है। हुनर की इस दौड़ में आधी आबादी कहीं पीछे न छूट जाए, इसकी भी हमें चिंता करनी होगी। भारत सरकार ने ड्रोन दीदी जैसे कई प्रोजेक्ट पर काम करके महिलाओं के कौशल विकास हेतु अपने इरादे दर्शाए हैं।
वैश्विक स्तर पर, 40% नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल में बदलाव की उम्मीद है। अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को प्रौद्योगिकी-संचालित नौकरियों में बदलाव के लिए प्रशिक्षण की कमी का सामना करना पड़ता है। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। यहां पेशेवर लोगों और श्रमिकों के कौशल में भी बदलाव की अपेक्षा है। तेजी से बदलते परिवेश में समसामयिक रहने की नितांत आवश्यकता है। अन्यथा अप्रासंगिकता का शिकार होने की आशंका हर समय बनी रहती है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फॉर्म की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया था कि 2025 तक आधे से अधिक कर्मचारियों को प्रौद्योगिकी अपनाने के कारण पुनः प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। भारत में 2026 तक एक मिलियन एआई इंजीनियर की आवश्यकता का अनुमान है। मशीन लर्निंग इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, और डेटा आर्किटेक्ट जैसे क्षेत्रों में मांग-आपूर्ति का अंतर 60-73% है। रि-स्किलिंग से इस खाई को पाटने उम्मीद प्रबल हो जाती है। यह निरंतर सीखने की ओर संकेत करता है।
भारत में 65 फीसदी आबादी 15-59 वर्ष आयु वर्ग में है, इसलिए दुनिया में सृजित हो रहे रोजगार के अवसरों में हिस्सेदारी लेने की क्षमता भी भारत में उसी अनुपात में विकसित होनी चाहिए। इस दिशा में भारत सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। हरियाणा के पलवल जिले में देश के पहले राजकीय कौशल विश्वविद्यालय की स्थापना इसका बड़ा उदाहरण है। इसके बाद से देश में तेजी से कौशल विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। इससे बड़ा स्किल इको सिस्टम और कौशल शिक्षा का मॉडल विकसित हुआ है। कौशल विकास हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की वरीयताओं में शामिल है।

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