21 अप्रैल रविवार श्री डूंगरगढ़ नेशनल हुक
पहले चरण का कम मतदान खड़े कर रहा कई सवाल, मतदाता की बेरुखी विस्मयकारी
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ की पैनी नजर
लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में कम होना राजनीतिक दलों के साथ राजनीतिक विश्लेषकों को भी चकित कर रहा है। इस बार तो सबने अधिक मतदान की अपेक्षा की थी और उसी के अनुसार प्रचार भी किया था। भाजपा ने इस बार हर बूथ पर वोट बढ़ाने का केम्पेन भी चलाया था और मिशन 400 का नारा भी दिया था। भाजपा ने लुभावनी मोदी की गारंटियों को खूब प्रचारित किया। कांग्रेस ने वादों का पत्र जारी किया और उसे घर घर बांटने का काम किया। राजद ने भी वचन पत्र जारी कर जनता से वादे किये और इस वचन पत्र को बिहार के हर घर तक पहुंचाने का प्रयास किया। चुनाव आयोग, जिला प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी शत प्रतिशत मतदान का अभियान बड़े पैमाने पर चलाया। इस बार तो व्यापारियों ने भी इस अभियान में भाग लेकर ग्राहकों के लिए लुभावनी घोषणाएं की। नव मतदाताओं के लिए कई आयोजन भी हुवै। इन सबके बाद भी पहले चरण में मतदान का प्रतिशत पिछली बार से कम हुआ। मतदाताओं की वोट देने को लेकर आई ये बेरुखी चिंताजनक व विस्मयकारी है। इस पर चुनाव आयोग व राजनीतिक दलों को मंथन करना चाहिए। किसी भी देश का लोकतंत्र तभी सुरक्षित रहता है जब उसमें मतदाताओं की अधिकाधिक भागीदारी रहती है। क्योंकि तभी जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार का गठन या निर्वाचन होता है।
मगर इस बार मतदाता की इस बेरुखी ने ये तो साबित किया है कि उसका भरोसा राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों से कम हुआ है। हर चुनाव में सभी दल घोषणा पत्र जारी करते हैं और लोक लुभावन वादे करते है। मगर सच ये है कि पांच साल में उस घोषणा पत्र पर न के बराबर काम होता है। ठीक इसी तरह उम्मीदवार भी स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से हाथ जोड़कर कई वादे करता है, मगर फिर उनको विस्मृत कर देता है। वो अपने क्षेत्र में भी गाहे बगाहे नजर आता है। उसी से मतदाता का भरोसा टूटा है और मतदान में उसकी रुची कम हुई है। जो सबके लिए चिंता का कारण बननी चाहिए। महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्धों पर कम बात होना भी मतदाता को पसंद नहीं आ रहा और वो विमुख होता है। मूल आवश्यकताओं व विकास के रोड मैप पर यदि दल और उम्मीदवार बात करे तो शायद मतदाता का भी मतदान के लिए रुझान बढ़ेगा। इसमें चुनाव आयोग को मुख्य भूमिका निभानी चाहिए। उसे इस बात पर नजर रखने का अधिकार मिलना चाहिए कि जिस दल की सरकार बनी है वो अपने घोषणा पत्र को पूरा कर रही या नहीं। तभी मतदाता को मजबूती मिलेगी और वो लोकतंत्र की रक्षा के लिए मतदान करेगा। इस विषय पर एक बार फिर से गम्भीर मंथन की जरूरत राजनीतिक दुराग्रह छोड़ करने आवश्यकता है। करेगा। इस विषय पर एक बार फिर से गम्भीर मंथन की जरूरत राजनीतिक दुराग्रह छोड़कर करने की
– मधु आचार्य ‘आशावादी’

















Leave a Reply