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कोयना बांध का जलस्तर हो रहा है लगातार कम; पुरा महाराष्ट्र मान्सून कि बारिश को लेकर चिंतित; बांध से गाद हटाने जाने कि मांग बढी

संवाद दाता सुधीर गोखले

कोयना बांध, जिसे वरददायिनी, भाग्यलक्ष्मी या पश्चिमी महाराष्ट्र के आर्थिक चक्र को बढ़ाने वाली शक्ति जैसे अनेक नाम दिए गए हैं, में शेष जल भंडार को देखते हुए इस वर्ष आम जनता के सामने यह प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है कि क्या भविष्य में बिजली उत्पादन और सिंचाई योजनाओं के साथ-साथ पेयजल की समस्या और भी गंभीर हो जाएगी। वर्तमान में, आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस बांध में केवल 8 से 9 टीएमसी जल भंडार ही उपलब्ध है। अगर हम इस बात के पीछे के कारणों पर गौर करें कि लगभग 105 टीएमसी जल भंडारण क्षमता वाले इस बांध में इस वर्ष केवल 9 टीएमसी जल ही क्यों बचा है, तो यह गौर करने पर पता चलता है कि बांध में जमा 5 टीएमसी जल और उसमें मौजूद गाद की मात्रा को देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या यह बांध वास्तव में इतना जल संग्रहित कर सकता है। अब अगर हम इस पर विचार करें, तो कोयना घाटी में फैली सह्याद्री पर्वत श्रृंखला, उसमें होने वाला मृदा अपरदन, भारी वर्षा और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण पर्वतीय घाटियों से भारी मात्रा में गाद और मिट्टी बहकर इस बांध में आ गई है। इसलिए, इस बांध की वर्तमान जल भंडारण क्षमता 105 टीएमसी है, जो एक सवाल को अनुत्तरित छोड़ देती है। वास्तव में, इसमें केवल 100 टीएमसी जल ही उपलब्ध होना चाहिए। इस साल मानसून ने अच्छी बारिश की है, जिससे बांध का जलस्तर काफी गिर गया है और कुछ इलाकों में नाममात्र का पानी ही बचा है। इसके चलते बांध के जलग्रहण क्षेत्र में छिपी ऐतिहासिक इमारतें, महल और बस्तियां साफ दिखाई देने लगी हैं। कुछ मंदिरों के खंडहर भी नजर आने लगे हैं। फिलहाल सोशल मीडिया पर इस बांध में जमा गाद को जल विज्ञानियों द्वारा सर्वेक्षण कराकर हटाने के अभियान की मांग को लेकर खूब चर्चा हो रही है। कुछ जानकार लोगों का मानना है कि अगर पिछले कुछ सालों में इस बांध से गाद नहीं हटाई गई है, तो इसे हटाने के अभियान पर जोर देना चाहिए। पाटन तालुका के कुछ वरिष्ठ जानकार लोगों के अनुसार, इस बांध को बने लगभग 60 साल हो चुके हैं, लेकिन उनका मानना है कि इसमें जमा गाद अभी तक नहीं हटाई गई है। यदि सरकार का जल संसाधन विभाग इस गाद नियंत्रण अभियान पर ध्यान दे, तो इस बांध की भंडारण क्षमता में निश्चित रूप से वृद्धि होगी और बिजली उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। साथ ही सिंचाई और पेयजल की समस्या का भी समाधान हो सकेगा।

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