अनिद्रा की महामारी – डिजिटल दुनिया ने छीनी युवाओं की नींद
संवाददाता:-हर्षल रावल
27 मार्च, 2026
सिरोही/राज.

सिरोही। भारतीय जन-जीवन में तेजी से घर करती डिजिटल जीवन शैली ने युवाओं की नींद को बुरे प्रकार से प्रभावित किया है। जिसके चलते उनमें आक्रामकता, अवसाद व आत्महत्या की प्रवृत्ति विकसित हो रही है।
देश-दुनिया में समय-समय पर आने वाले विभिन्न सर्वेक्षण इस संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। लेकिन देश में किशोरों का स्क्रीन टाइम घातक ढंग से बढ़ रहा है। आमतौर पर चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि किशोरों की सेहत के लिये आठ घंटे की नींद आवश्यक होती है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ आठ घंटे के बजाय सात-छह घंटे की नींद को भी पर्याप्त मानते हैं, बशर्ते उसमें बीच में किसी प्रकार का व्यवधान न हो। लेकिन बिना किसी आवश्यक कार्य के कथित सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना आज के दौर में फैशन सा बन गया है।

अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों में हुए हालिया शोध बताते हैं कि रात्रि में शीघ्र सोने व सुबह शीघ्र उठने से उत्तम स्वास्थ्य बनता है। यह भारतीय जीवन दर्शन की अपरिहार्य धारणा भी रही है। लेकिन देश में पहले टीवी और अब मोबाइल फोन के अनियंत्रित उपयोग ने युवाओं की रात्रि की नींद उड़ा दी है। जिसके चलते युवा पूरे दिन उखड़े-उखड़े और अशांत रहते हैं। उनमें आक्रामकता बढ़ रही है। फिर वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। बाधित नींद की इस स्थिति में कालांतर मन में आत्महत्या जैसे नकारात्मक भाव उमड़ने लगते हैं।
एक सर्वे बताता है कि देश में 73 फीसदी दसवीं के छात्र आठ घंटे से कम की नींद सोते हैं। कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के विशेषज्ञ बताते हैं कि विश्व में 60 से 70 फीसदी किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। दरअसल, आज छात्रों पर अभिभावकों व शिक्षकों का अनुशासन कम ही चलता है। माता-पिता के टोकने पर वे दलील देते हैं कि ऑन लाइन पढ़ाई चल रही है। कोरोना संकट ने देश-दुनिया में ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प तो दिया, लेकिन तमाम प्रकार की विसंगतियां व विकृतियां भी किशोरों के जीवन में भर दी हैं।

एक चौंकाने वाला आंकड़ा बताता है कि देश में सत्तर करोड़ भारतीय छह घंटे की नींद नहीं ले पाते। वहीं 46 प्रतिशत भारतीय छह घंटे से कम की नींद ले पाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा संकट युवाओं व किशोरों से जुड़ा है। वे देर रात्रि तक ऑनलाइन गेमों से जुड़े रहते हैं। रात्रि में जाने-अनजाने मित्र उनके सहभागी बनते हैं। जो कालांतर एक नशे की लत का रूप ले लेता है। परिजनों की रोक-टोक उन्हें रास नहीं आती।
कई घटनाओं में उनके आक्रामक व्यवहार के घातक परिणाम सामने आए हैं। यहां तक कि नजदीकी परिजनों की हत्या की घटनाएं भी हुई हैं। दरअसल, ऑनलाइन खेलों को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि वे किशोरों के लिये नशा बन जाते हैं। रात्रि का एकांत उन्हें रास आता है। जिसके चलते वे नींद की परवाह नहीं करते।
वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसे अनेकों प्लेटफॉर्मों पर तमाम वर्जित व अश्लील सामग्री की रात्रि में भरमार रहती है। जिसकी चपेट में छोटे-बड़े लोग आ रहे हैं। युवा देर रात्रि का एकांत तलाशते हैं, ताकि परिजनों की अनुपस्थिति में वे मनमानी कर सकें। वे देर रात्रि तक ऑनलाइन रहने में अपना गर्व समझते हैं। यह भूल जाते हैं कि वास्तव में, वे अपनी सेहत से किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ चेतावनी देते रहे हैं, अनिद्रा से उच्च रक्तचाप, हार्ट अटैक की समस्या पैदा हो रही है। जो कालांतर हाइपरटेंशन में बदल जाती है।
दरअसल, शरीर की जैविक घड़ी के परिचालन में व्यवधान से शरीर नकारात्मक प्रतिक्रिया देता है। देर रात्रि जागने और मोबाइल के नशे में किशोर असमय खाते-पीते हैं, जिससे उनमें मोटापे की समस्या भी घर कर रही है। यही कारण है कि अब किशोरों तक में डाइबिटीज की समस्या देखने में आ रही है।
दरअसल, प्राकृतिक सोने के समय का विकल्प देर रात्रि अथवा सुबह की नींद नहीं हो सकती है। यह संकट बड़ा है और अभिभावकों व शिक्षकों को किशोरों की देर रात्रि जागने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिये गंभीर प्रयास करने होंगे। अन्यथा देश को कालांतर अस्वस्थ युवा पीढ़ी का संत्रास झेलने को बाध्य होना पड़ेगा।
















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