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बीकानेर-रविवार से शुरू हो रहा है जैन समाज का पर्युषण महापर्व 9दिनों तक चलेगा नवाह्निक कार्यक्रम आत्मशुद्धि के महास्नान का महापर्व है पर्युषण: राजू हिरावत(पत्रकार)

सवांददाता चीफ रिपोर्टर रमाकान्त झंवर बीकानेर श्रीडूंगरगढ

रविवार से शुरू हो रहा है जैन समाज का पर्युषण महापर्व
9दिनों तक चलेगा नवाह्निक कार्यक्रम
आत्मशुद्धि के महास्नान का महापर्व है पर्युषण: राजू हिरावत(पत्रकार)

श्रीडूंगरगढ़। जैन समाज के महापर्व पर्युषण महापर्व का 1सितंबर को शुभांरभ होने वाला है। जैन समाज द्वारा पर्युषण महापर्व को 9दिनों तक विशेष दिनों में मनाया जाता है और इसका वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार भी इन दिनों को नियोजित करने में निहित है। इस बार 1सितंबर, रविवार से शुरू होने वाले अपने इस नवाह्निक अनुष्ठान में जैन धर्मावलंबियों द्वारा प्रतिदिन 3सामायिक, 1घण्टे स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य का पालन, सचित्त और जमीकंद का त्याग, सिनेमा-नाटक आदि का परिहार, रात्रि भोजन का त्याग, आधे घण्टे जप व त्याग, 2घण्टे मौन, 9द्रव्यों से अधिक खाने के त्याग सहित साधु या साध्वियों के दर्शन करने की आराधना की जाती है। जिस प्रकार स्थूल शरीर के पोषण के लिए सभी भौतिक क्रियाकलाप आवश्यक है उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर( आत्मा) के पोषण के लिए पर्युषण पर्व की आराधना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है।
पर्युषण महापर्व को आध्यात्मिक और वैज्ञानिक तरीके से 9दिनों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक दिवस की अपनी महत्ता इसमें निहित है। पर्युषण के प्रथम दिवस को “खाद्य संयम दिवस”; दूसरे दिन को स्वाध्याय दिवस; तीसरे दिन को सामायिक दिवस; चौथे दिन को वाणी संयम दिवस; पांचवे दिन को अणुव्रत चेतना दिवस; छठे दिन को जप दिवस; सातवें दिन को ध्यान दिवस; आठवें दिन को संवत्सरी महापर्व दिवस और अंतिम नौवें दिन को क्षमायाचना दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रत्येक दिवस को जिस दिन के साथ मनाया जाता है उसका वैज्ञानिक आधार भी बहुत गहरा है। व्यक्ति की खाने की वस्तुओं पर नियंत्रण होगा तो ही वह तप कर पायेगा। खाद्य नियंत्रण होने पर ही वह अपना मन स्वाध्याय में लगा सकता है और वह किसी ग्रंथ को पढ़ पाने में खुद को नियोजित कर सकता है। इसके साथ ही उसे समता की साधना भी नितांत आवश्यक है क्योंकि तप में समता रखना ही एक अनिवार्य अंग है। समता के साथ वाणी के संयम का अभ्यास भी जरूरी है। प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे संकल्प लेकर (अणुव्रत) से स्वयं को त्याग के पथ पर अग्रसर कर सकता है। इसके साथ ही जप से एकाग्रता और एकाग्रता से ध्यान की अवस्था को प्राप्त करता है। इसके बाद संवत्सरी को प्रत्येक भौतिक कार्य से निवृत्त करते हुए सभी दिवसों का इस दिन समायोजन कर निराहार रहता है और नौवें दिन सरल हृदय से आत्मानुभूति करते हुए प्रत्येक जीवमात्र से क्षमायाचना करता है और देता है।

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