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बीकानेर-विदूषी पूजा जोशी ने रामकथा प्रवचन के दौरान शिव कथा महात्म्य का प्रसंग सुनाया। कोलकाता

सवांददाता मीडिया प्रभारी मनोज मूंधड़ा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़

विदूषी पूजा जोशी ने रामकथा प्रवचन के दौरान शिव कथा महात्म्य का प्रसंग सुनाया। कोलकाता

श्रीराम कथा के दूसरे दिन शिव पार्वती विवाह का वर्णन सुनाया विदुषी पूजा जोशी ने कहा धैर्य सहनशीलता ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। कलकत्ता ऐजेंट्स एसोससिएशन के तत्वावधान में व्यापारी वर्ग के कल्याणार्थ आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन आज व्यास पीठ से विदुषी पूजा जोशी ने शिव पार्वती विवाह का बड़े ही सुंदर तरीक़े से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में रिश्ते स्वार्थ से वशीभूत होकर सिर्फ़ अपने खुद के परिवार तक ही सिमटते जा रहे है अपने बच्चों अपने परिवार की देखभाल तो सामान्य ज्ञान रखने वाले जानवर भी करते है।रिश्तों की कद्र किजिए क्योंकि ये सभी एक निश्चित अवधि के लिेए मिले है।कोशिश किजिए कि परिवार के सभी लोग साथ बैठें,साथ मिलकर खाना खाएं इससे निकटता आयेगी,और प्यार बढ़ेगा। विदुषी पूजा जोशी ने कहा कि घर परिवार को बांधे रखने के लिेए धैर्य
सहनशीलता सबसे पहली और बड़ी जरुरत है। मानस हमें सहनशीलता सीखाती है।राम का राज्याभिषेक किए जाने की घोषणा के बाद अगले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा पर उन्होंने किसी तरह का कोई प्रतिरोध नहीं किया विरोध नहीं किया । त्याग उच्चारण में नहीं आचरण में होना चाहिए साधु कोई वेष धारण करने से नहीं बनता साधुता तो मनुष्य के स्वभाव में होना चाहिए।किसी से अनबन हो तो उसका विरोध मत किजिए उसे खरी खोटी मत सुनाइये शान्त रहिए मौन पालन किजिए। क्योंकि सहनशीलता का ही दूसरा नाम तपस्या है।संदेह विष के समान है जो हृदय से किसी को दूर कर देता है।सीता हरण से व्याकुल श्रीराम के द्वारा वन के पशु पक्षियों से सीता के बारे में पूछे जाने पर सती को संदेह हुआ कि क्या ये वही राम है जो ज्ञान के भंडार है।यदि है तो फिर अपनी ही लीला से अंजान क्यों है। क्यों किसी एक आम व्यक्ति की तरह सीता के वियोग में इस तरह से रुदन क्यों कर रहे है ? संदेह ने सती को श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए विवश किया वो माता सीता का वेष धर कर भगवान श्रीराम राम के सामने से होते हुए समक्ष आ उपस्थित हुई राम ने पहचान लिया क्योंकि सीता को हमेशा उनके पीछे-पीछे ही चली थी। भगवान शिव को जब मालूम हुआ कि सती ने माता का रुप धारण कर लिया था तो वे सित्तासी हज़ार साल के लिये समाधि अवस्था पर चले गये । समाधि टूटी तो उन्होंने सती से बिना कुछ कहे उनका आसन वामअंग से हटाकर सामने की ओर लगा दिया सती में माता सीता दर्शन करने के बाद भगवान शिव ने मन ही मन विचार कर लिया कि इस शरीर के प्रति तो अब पत्नी वाली भाव स्थिति उत्पन्न नहीं हो पायेगी दक्ष से सभा में अनबन होने की बात भी सती से न कह कर उन्होंने सिर्फ़ इतना ही कहा-प्रजापति पद पर आसीन होने के बाद तो अब उनके कहने ही क्या,बहुत कुछ कहा भी और सुना भी बहुत ही आनंद आया पति के मना करने के बावजूद भी सती अपने पिता दक्ष के द्वारा कराये गये यज्ञ अनुष्ठान में पहुँची सती ने यज्ञशाला में कूदकर देह त्यागी,दक्ष के अहंकार का मर्दन हुआ मैं,मैं करने वाले दक्ष को बकरे का सिर लगा इसलिेए पद ,प्रतिष्ठा को लेकर कभी झूठा अंहकार मत पालिए क्योंकि जो कुछ भी है प्रभु की ही लीला मात्र है आज की कथा में नियमानुसार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिशंकर झंवर मंत्री ललित सिंघी ने परिवार-सदस्यों सहित आरती के आयोजन में हिस्सा लिया आनंद झुनझुनवाला,जगदीश मूंधड़ा दुर्गा व्यास,मदनलाल जोशी,बाबूलाल अग्रवाल,विश्वनाथ भुवालका,संरक्षक रमेश नांगलिया आदि कई गणमान्य व्यक्ति आयोजन में उपस्थित रहें । संचालन महावीर प्रसाद रावत ने किया यह जानकारी पिताश्री मदनलाल जोशी कोलकाता ने दी।

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