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25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने पर लोकतंत्र सेनानी गोवर्धन शुक्ला ने जताया केंद्र सरकार का आभार

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सत्यार्थ न्यूज़
मनोज कुमार माली सुसनेर

25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने पर लोकतंत्र सेनानी गोवर्धन शुक्ला ने जताया केंद्र सरकार का आभार

 

सुसनेर। में आभारी हु मे केंद्र सरकार का जिन्होंने 25 जून को सविंधान हत्या के रूप मे मनाये जाने की अधिसूचना जारी कर इसे संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। सन 1975 की 25 जून को लगी आपातकाल की यातनाओ को मैंने भोगा है। क्योंकि इस काले दिवस के कारण मुझे तथा मेरे पिताजी दोनो को 19 माह जेल मे रखा उस समय मेरी आयु 22 वर्ष की थी। एवं उस समय घर का पुरुष मुखिया कोई नही था। खेती और व्यवसाय सब बर्बाद हो गए थे। फिर भी हमे लोकतंत्र के लिए लड़ने की एवं उसे बचाने का दिल मे जज्बा था। उक्त बात लोकतंत्र सेनानी संघ के जिला उपाध्यक्ष गोवर्धन शुक्ला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने की धोषणा करने पर अपनी खुशी व्यक्त कर की। उन्होंने आगे कहा की हम उस समय आपातकाल का विरोध करके जेल में गए तो ये शेर अक्सर बोलते थे कि
चिरागों की हिफाजत करते-करते हवा का रुख बदलना आ गया।
आग कब तक बरसाएगा सूरज हमें अंगारों पर चलना आ गया।
मीसाबंदी श्री शुक्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि 25 जून 1975 को आजाद भारत के इतिहास का सबसे काला दिन कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसी दिन संविधान को ताक पर रखकर आपातकाल मतलब इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई थी। यह फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिया था और इसी के साथ आजाद भारत के लोग सरकार के गुलाम बनकर रह गए थे। आम लोगों की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई थी और सरकार तय करने लगी थी कि वे कितने बच्चे पैदा करेंगे, क्या बोलेंगे, क्या देखेंगे…आम लोग तो छोड़ ही दें, 21 महीनों तक विपक्ष के सभी नेता या तो जेल में बंद कर दिए गए थे या फिर वे फरार थे। इंदिरा गांधी इमरजेंसी लगाकर बहुत ज्यादा ताकतवर हो चुकी थीं. संसद, अदालत, मीडिया किसी में उनके खिलाफ बोलने की ताकत नहीं रह गई थी। आज केंद्र सरकार ने इसी तारीख को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। जो स्वागत योग्य है।
क्यों लगाया था पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल
लोकतंत्र सेनानी गोवर्धन शुक्ला ने उस दिनों को याद कर बताया कि 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक फैसले में इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था। इसमें इंदिरा ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था, लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसे खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा गांधी ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था कि “जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी।”
चित्र : लोकतंत्र सेनानी गोवर्धन शुक्ला।

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