सत्यार्थ न्यूज़ ब्यूरो भीलवाड़ा रिपोर्टर अब्दुल सलाम रंगरेज
लुप्त होती बहूरुपिया कला-
स्वांग रचाकर पालते हैं अपना पेट– शब्बीर मो.
भीलवाड़ा-–हमारे देश की अनेक सांस्कृतिक परम्पराओं में से एक है- स्वांग रचने की कला। इस कला को बहुरुपिया कला के नाम से जाना जाता है। एक ही कलाकार द्वारा विभिन्न पात्रों का हूबहू स्वांग रचकर सीमित साधन, पात्रानुकूल वेशभूषा व बोली, विषयगत हाव-भावों का मनोरंजक प्रस्तुतीकरण ही बहुरुपिया कला है।
ऐसा ही एक कलाकार शब्बीर मोहम्मद पिता निजाम मोहम्मद जो कि टोंक का रहने वाला है। भीलवाड़ा के काछोला कस्बे में स्वांग रचाकर अपनी भाषा ,बोली के माध्यम से लोगों को आकर्षित कर रहा है। उनका कहना कि हमारे बाप दादा राजाओं के समय से ही बहुरूपिया कला और स्वांग रचाकर मनोरंजन करते रहे है। राजाओं के समय में इस कला को बहुत सम्मान मिलता था लेकिन समय के साथ अब यह कला लुप्त होती जा रही है। इससे ज्यादा आमदनी भी नहीं हो पाती। दुकानदार और लोग हमको जितना भी पैसा देते हैं हम उसमें ही संतुष्ट हो जाते हैं।अपने बच्चों को शिक्षा के बारे में पूछने पर शब्बीर भाई ने सत्यार्थ न्यूज़ को बताया कि अब हम अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। क्योंकि इससे पेट तो भरा जा सकता है लेकिन आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं की जा सकती। और समाज में इतना सम्मान नहीं मिल पाता।हम जब तक जिंदा है हम हैं इस कला को जीवित रखेंगे।

















Leave a Reply