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संपादकीय लेख: स्व. चंद्रशेखर सिंह जी की पुण्यतिथि – एक युगपुरुष को नमन

संपादकीय लेख: स्व. चंद्रशेखर सिंह जी की पुण्यतिथि – एक युगपुरुष को नमन

आज, 8 जुलाई 2025, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी विचारधारा के प्रखर पुरोधा स्व. चंद्रशेखर सिंह जी की पुण्यतिथि है। यह दिन हमें उस महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर देता है, जिन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को नई दिशा दी, बल्कि अपने साहस, सिद्धांतों और जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण से देश के गरीब, शोषित और वंचित वर्गों की आवाज बने। भारतीय राजनीति में “युवा तुर्क” के रूप में विख्यात चंद्रशेखर जी का जीवन सादगी, संघर्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का प्रतीक रहा। उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके विचारों को पुनर्जनन की प्रेरणा के रूप में देखते हैं।

### *चंद्रशेखर जी का जीवन और प्रारंभिक संघर्ष*
17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखर सिंह जी का जीवन शुरू से ही संघर्षमय रहा। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और छात्र जीवन से ही समाजवादी आंदोलनों की ओर आकर्षित हुए। आचार्य नरेंद्र देव जैसे समाजवादी नेताओं के साथ निकटता ने उनके विचारों को और प्रखर किया। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए, जहां उन्होंने अपनी बेबाकी और निष्पक्षता से “युवा तुर्क” का खिताब अर्जित किया।

चंद्रशेखर जी का व्यक्तित्व केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। वे एक प्रखर वक्ता, विद्वान लेखक और गहन चिंतक थे। उनकी लेखनी में गहरी वैचारिकता और समाज के प्रति संवेदनशीलता झलकती थी। उन्होंने “यंग इंडिया” नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का संपादन किया, जिसके संपादकीय बुद्धिजीवियों और आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय थे। उनके लेखन में सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण और उनके समाधान का स्पष्ट दृष्टिकोण होता था। उनकी पुस्तक “मेरी जेल डायरी” और संग्रह “डायनेमिक्स ऑफ चेंज” उनके चिंतन और लेखन की गहराई को दर्शाते हैं।

### *प्रधानमंत्री के रूप में योगदान*

चंद्रशेखर जी 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के आठवें प्रधानमंत्री रहे। उनका कार्यकाल भले ही केवल चार महीने का रहा, लेकिन इस अल्प समय में भी उन्होंने अपनी दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय दिया। वे पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने कोई पूर्व सरकारी पद संभाले बिना सीधे इस सर्वोच्च पद को ग्रहण किया। उनकी सरकार अल्पमत में थी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर निर्भर थी। इसके बावजूद, उन्होंने देश के सामने मौजूद आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने का प्रयास किया।

उनके कार्यकाल में देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। मूडीज ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को डाउनग्रेड कर दिया था, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक से सहायता प्राप्त करना मुश्किल हो गया था। चंद्रशेखर जी की सरकार को बजट पारित करने में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, उन्होंने साहस और धैर्य के साथ स्थिति को संभालने का प्रयास किया। जब कांग्रेस ने राजीव गांधी की कथित जासूसी के आरोप में समर्थन वापस लिया, तो उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए संसद भंग करने और नए चुनाव कराने की सिफारिश की। यह निर्णय उनके सिद्धांतों और लोकतंत्र के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को दर्शाता है।

### *आपातकाल और जेल डायरी*
1975 में आपातकाल के दौरान चंद्रशेखर जी को इंदिरा गांधी सरकार ने जेल में डाल दिया था। इस दौरान भी उनकी लेखनी रुकी नहीं। जेल में रहते हुए उन्होंने “मेरी जेल डायरी” लिखी, जिसमें उन्होंने राजनीतिक बंदियों की कठिनाइयों और आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर लगे अंकुश का मार्मिक चित्रण किया। इस पुस्तक में उनकी गहरी संवेदनशीलता और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता झलकती है। आपातकाल के दौरान “यंग इंडिया” का प्रकाशन बंद हो गया, लेकिन 1989 में इसे पुनः शुरू किया गया, जिसके संपादकीय सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष स्वयं चंद्रशेखर जी थे।
### *सामाजिक परिवर्तन के प्रति समर्पण*
चंद्रशेखर जी का जीवन सामाजिक परिवर्तन और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित था। वे सत्ता की राजनीति के बजाय मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति में विश्वास रखते थे। उनकी बेबाकी और स्पष्टवादिता ने उन्हें राजनीतिक हलकों में एक अलग पहचान दी। वे हमेशा गरीबों, किसानों और वंचितों के हितों की पैरवी करते थे। उनकी यात्राओं ने उन्हें भारत की आत्मा को समझने का अवसर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनका जनता से गहरा जुड़ाव बना।

उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। जैसा कि उन्होंने कहा था, “जब सत्ता जनता को बाँटने लगे, तब समझो लोकतंत्र खतरे में है।” यह कथन आज के समय में भी उतना ही सटीक है, जब राजनीति में ध्रुवीकरण और सत्ता के दुरुपयोग की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।

### *आज के संदर्भ में प्रासंगिकता*
चंद्रशेखर जी का जीवन और विचार आज के भारत के लिए कई मायनों में प्रेरणादायी हैं। उनकी सादगी, सिद्धांतों के प्रति निष्ठा और जनता के प्रति समर्पण आज के नेताओं के लिए एक आदर्श है। उनकी पुण्यतिथि हमें यह याद दिलाती है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो सत्ता के मोह से ऊपर उठकर समाज के हित में कार्य करे। उनकी लेखनी और विचारधारा आज भी हमें सामाजिक समानता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के लिए प्रेरित करती है।

### *निष्कर्ष*
स्व. चंद्रशेखर सिंह जी एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने अपने जीवन को समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके योगदान को स्मरण करते हैं और उनके विचारों को आत्मसात करने का संकल्प लेते हैं। उनकी बेबाक आवाज, साहस और सादगी हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी। भारत की विकास यात्रा में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्हें शत्-शत् नमन।

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