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सोनभद्र -जातिगत जनगणना वर्तमान समय की जरूरत – अभय पटेल

जातिगत जनगणना वर्तमान समय की जरूरत – अभय पटेल

 

सोनभद्र /सत्यनारायण जटिया/संतेश्वर सिंह

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जातिगत जनगणना का मतलब क्या है, आखिर क्यों इसकी जरूरत पड़ी?

जातिगत जनगणना का सीधा मतलब होता है कि देश में किसी जाति के कितने लोग हैं, इसके स्पष्ट आंकड़े देश के सामने रखे जाएं। देश में जातिगत जनगणना पहले भी हुई है, लेकिन तब ओबीसी वर्ग को उसमें शामिल नहीं किया जाता था।

केंद्र की एनडीए सरकार ने जातिगत जनगणना करवाने का फैसला किया है। लंबे समय से यह मांग चल रही थी, तब जाकर केंद्र ने इसे हरी झंडी दिखाई है। अब जातिगत जनगणना के एक ऐलान ने पूरे देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। बड़ी बात यह है कि विपक्ष इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है, जबकि ऐसा नहीं है। जातिगत जनगणना वर्तमान समय में प्रत्येक समाज के समुचित भागीदारी एवं उत्थान हेतु लिया गया फैसला है।

ऐसे में बात जब भी जातिगत जनगणना की होती है, सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रहती है कि देश में ओबीसी वर्ग अब कितना ज्यादा बड़ा बन चुका है, आखिर इस समाज के कितने लोग देश में रह रहे हैं? इस बार भी जो जातिगत जनगणना करवाई जाएगी, सभी की नजर सिर्फ इस बात पर रहेगी कि ओबीसी कितने प्रतिशत हैं।

जातिगत जनगणना का इतिहास क्या है?

जातिगत जनगणना की शुरुआत अंग्रेजों के समय से हो गई थी। सबसे पहले साल 1931 में जातिगत जनगणना करवाई गई थी। अंग्रेजों के दौर में तो वैसे भी हिंदुस्तान के लोगों को जाति के आधार पर ही देखा जाता था, ऐसे में तब ऐसी किसी भी जनगणना का होना काफी आम बात थी। वैसे एक बात तो उसी समय तय कर दी गई थी कि हर 10 साल में जातिगत जनगणना करवाई जाएगी। ऐसे में 1941 में भी इस प्रक्रिया को किया गया, लेकिन तब आंकड़े सामने नहीं रखे गए।

फिर देश आजाद हुआ और 1951 में फिर जातिगत जनगणना करवाई गई। यहां पर पहली बार बड़ा खेल हुआ, इतने बड़े सर्वे में ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किया गया। सिर्फ अनुसूचित और अनुसूचित जनजातियों को जनगणना में रखा गया। 2011 तक ऐसे ही चलता रहा, जनगणना तो हुई लेकिन ओबीसी वर्ग को लेकर ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई।

जातिगत जनगणना की अब क्यों जरूरत?

असल में देश में जब मंडल कमीशन लागू हुआ था, तब कहा गया था कि देश में ओबीसी वर्ग की आबादी 52 फीसदी है। लेकिन तब वीपी सरकार जिस 52 फीसदी के आंकड़े तक पहुंची थी, उसका आधार 1931 का सेंसस था। ऐसे में उसे कितना सटीक माना जाए, यही सबसे बड़ा सवाल रहा। तर्क दिया गया कि देश में समय के साथ ओबीसी की आबादी भी बदल चुकी है, काफी ज्यादा बढ़ी भी है, ऐसे में 52 फीसदी का आंकड़ा कितना सही माना जाए? अब यह सवाल उन पार्टियों द्वारा सबसे ज्यादा उठाया गया जो चाहते थे कि जातिगत जनगणना करवाई जाए।

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में साफ कर दिया था कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती है। अब यही पर जातिगत जनगणना की बात करना जरूरी है। इसका विरोध करने वाले मानते हैं कि अगर ओबीसी की आबादी ज्यादा निकली तो 50 फीसदी की सीमा को भी तोड़ दिया जाएगा। कुछ का तर्क तो यह भी है कि ऐसे किसी भी सेंसस से देश में और ज्यादा बंटवारा हो जाएगा।

 

जातिगत जनगणना से किसको फायदा है?

जातिगत जनगणना का जो समर्थन करते हैं, उनका तो साफ मानना है कि एक सेंसस से पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के बारे में काफी कुछ पता चलेगा। उनकी शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति को लेकर आंकड़ों से स्पष्टता आएगी। सरकार भी उनके लिए और मजबूती के साथ नीतियां बना पाएंगी तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें लागू भी किया जा सकता है।

तनाव के बीच मोदी कैबिनेट ने बड़ा फैसला लेते हुए जातिगत जनगणना कराने का ऐलान कर अब एनडीए ओबीसी वोटरों के बीच में खासा लोकप्रिय हो चुकी है।

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