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महाकुंभ मेला 2025 की अव्यवस्थाओं पर मातृ सदन का वक्तव्य

पारुल राठौर
मातृसदन, हरिद्वार

महाकुंभ मेला 2025 की अव्यवस्थाओं पर मातृ सदन का वक्तव्य

प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मेला 2025 को लेकर इन दिनों चर्चा अपने चरम पर है। मातृ सदन ने भी इस मेले में अपनी सहभागिता निभाई और मुक्‍ति मार्ग सेक्टर 18 में अपना शिविर स्थापित किया। परम पूज्य श्री गुरुदेव जी की उपस्थिति मेले में 21 जनवरी से 3 फरवरी तक रही, और हमने उनके सानिध्य में मौनी अमावस्या एवं वसंत पंचमी के दोनों अमृत स्नानों में भाग लिया।

किन्तु यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि इस बार की अव्यवस्थाएं अभूतपूर्व थीं, जो इससे पूर्व किसी भी कुंभ में देखने को नहीं मिली थीं। स्वच्छता, ध्वनि प्रदूषण, वायु एवं धूल प्रदूषण जैसी मूलभूत समस्याओं के अतिरिक्त, सबसे चिंताजनक प्रशासन की भारी असफलता रही, जो इतने विशाल जनसमूह को संभालने में पूर्णतः अक्षम सिद्ध हुई।

29 जनवरी की सुबह हुए भयावह हादसे और उसके परिणामस्वरूप हुई जनहानि को प्रशासन ने पूरी तरह से छुपाने का प्रयास किया। किसी भी प्रकार के सही आंकड़े उपलब्ध न कराकर, प्रशासन ने केवल लीपापोती करने की नीति अपनाई। इतना ही नहीं, तथाकथित अखाड़ा परिषद और उसके स्वयंभू अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी, जो मात्र सरकार के मुखपत्र एवं आज्ञाकारी उपकरण के रूप में कार्य कर रहे हैं, इस त्रासदी में दिवंगत हुए दर्जनों श्रद्धालुओं की मृत्यु को तुच्छ एवं नगण्य बताकर, सरकार के पाखंडपूर्ण ‘दिव्य-भव्य कुंभ’ अभियान को चमकाने में जुटे हुए हैं। जब इतने में भी मन नहीं माना, तो शंकराचार्य के विरुद्ध वक्तव्य देने की कवायद में लग गए। प्रश्न है कि महंत रविंद्र पुरी कौन होते हैं शंकराचार्य के विरुद्ध बयान देने वाले? इनको किसने अधिकार दिया कि ये पूर्व द्वयपीठाधीश्वर, ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी की इच्छा, उनकी वसीयत पर प्रश्न उठाएं? इन्हें इतने लोगों की मृत्यु नहीं दिखाई दी, लेकिन सरकार से किसी ने इस मुद्दे पर प्रश्न खड़ा किया तो इन्हें ये बात इतनी बुरी लग गई कि ये शंकराचार्य पर प्रश्न उठाने लगे और महाशय अपने प्रश्नों से ही यह स्पष्ट करने लगे कि वे किस कोटि के संत हैं और उन्हें आध्यात्म तो दूर, व्यावहारिक विषयों का भी कितना ज्ञान है।

वास्तविकता यह है कि यह कुंभ आम श्रद्धालु के लिए नहीं, बल्कि केवल वीआईपी स्नानों और प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के छायाचित्रों के प्रचार तक सीमित रह गया। केवल किस प्रकार होर्डिंग लगाकर, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में नाम हो, प्रचार हो, समस्त तंत्र को इस दिशा में ही केंद्रित किया गया। कैसे अधिक से अधिक लोग महाकुंभ में स्नान का लाभ ले सकें, इसपर किसी का ध्यान नहीं था। तभी स्नान घाटों से नजदीक की भूमि सत्ताधारी पार्टियों से संबंधित संस्थाओं को दे दी गई जिसमें आम श्रद्धालुओं के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी । प्रशासन की इस कूटनीति एवं पाखंड के विरुद्ध जो एकमात्र संत मुखर होकर बोले, उन पर यह सरकारपरस्त परिषद अब आक्रमण कर रही है। मातृ सदन स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज के बयानों का समर्थन करती है और उनके साथ खड़ी है।

प्रश्न उठता है – अखाड़ा परिषद क्या है? वर्तमान समय में इसका क्या योगदान है, सिवाय इसके कि यह केवल अखाड़ों की संपत्तियों को बेचने और नष्ट करने का कार्य कर रही है? अखाड़ा परिषद पहले तो जवाब दे कि इनके पूर्व अध्यक्ष को आखिर आत्महत्या क्यों करनी पड़ी? क्या कारण है कि परिषद किसी एक अध्यक्ष को मानने को तैयार नहीं है और अनेक व्यक्ति स्वयं को अपने-अपने गुट के अध्यक्ष घोषित किये हुए हैं? इन कथित अखाड़ा परिषद के पदाधिकारियों से पूछा जाए कि इनके द्वारा संन्यास के किस मूल धर्म का पालन किया जा रहा है?

हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अखाड़ा परिषद, जो अब अपने मूल उद्देश्य और सार्थकता को पूरी तरह खो चुकी है, इसे तुरंत भंग किया जाना चाहिए। अखाड़ा परिषद की भूमिका अब मात्र एक रबड़ स्टाम्प के रूप में रह गई है और धर्म की प्रतिष्ठा के लिए इनका कोई भी कार्य पटल पर सामने नहीं हैं और इनके पदाधिकारी मात्र अखाड़ों की संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने में लगे हुए हैं। इसके स्थान पर एक नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जाए, जिसमें सभी तथाकथित अखाड़ों को एकीकृत कर केवल दो मुख्य धड़े रहें – एक संन्यासियों के लिए और दूसरा बैरागियों के लिए। संन्यासियों का नेतृत्व सीधे शंकराचार्यों के अधीन हो तथा बैरागियों का नेतृत्व उनके रामानंदाचार्य आदि के अधीन हो। विभिन्न अखाड़ों के अनियंत्रित विभाजन और अनुशासनहीनता के कारण ही भारतवर्ष में संन्यास और उसके सिद्धांतों का इतना पतन हुआ है जिसे अब दूर किया जाना अत्यावश्यक है।

संतों को सरकार की गलतियों को ढंकने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। उनका धर्म सत्य और धर्म की रक्षा करना है, न कि सत्ता की चाटुकारिता करना। मातृ सदन इस मुद्दे पर पूरी निष्ठा के साथ सत्य के पक्ष में खड़ी है और पूज्य शंकराचार्य जी के वक्तव्यों का पूर्ण समर्थन करती है ।

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