Advertisement

इन्फैंट्री डे: देश के पहले मिलिट्री ऑपरेशन में किया था कमाल, क्‍यों इतनी खास है हमारी पैदल सेना?

 

इन्फैंट्री डे: देश के पहले मिलिट्री ऑपरेशन में किया था कमाल, क्‍यों इतनी खास है हमारी पैदल सेना?

पलवल-27 अक्टूबर
कृष्ण कुमार छाबड़ा

हर साल 27 अक्‍टूबर को इन्‍फैंट्री डे यानी ‘पैदल सेना दिवस’ मनाया जाता है। भारतीय सेना की इस डिविजन का इतिहास बेहद खास है और आजादी के ठीक बाद ही इन्‍फैंट्री को अपना कौशल दिखाने का मौका मिला था।

देश आज ‘पैदल सेना दिवस’ मना रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी इन्‍फैंट्री डिविजन भारत में है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पैदल सैनिकों की संख्‍या बढ़कर करीब 12 लाख 40 हजार है। फ्रंटलाइन पर रहकर देश की सुरक्षा करने वाली पैदल सेना के नाम 27 अक्‍टूबर का दिन है। आखिर हम 27 अक्‍टूबर को ही ‘पैदल सेना दिवस’ क्‍यों मनाते हैं? यह जानने के लिए आपको चलना होगा भारत की आजादी के साल यानी 1947 में। जब इसी पैदल सेना के रणबांकुरों ने देश का एक बड़ा भूभाग पाकिस्‍तान के हाथ में जाने से बचाया था। वह आजाद भारत की पहली ऐसी सैन्‍य कार्रवाई थी जिसमें बड़े पैमाने पर सेना का इस्‍तेमाल हुआ। देश को अपना पहला परमवीर चक्र विजेता भी 1947 में इन्‍फैंट्री डिविजन से ही मिला

अक्टूबर 1947 का महीना था। देश को आजाद हुए कुछ महीने हुए थे। तीन देशी रियासतों ने भारत में विलय से इनकार कर दिया था। उनमें से एक रियासत जम्मू-कश्मीर की भी थी जिसके उस समय शासक महाराजा हरि सिंह थे। मुस्लिमों की बड़ी आबादी होने की वजह से कश्मीर पर जिन्ना की पहले से नजर थी और हरि सिंह के इनकार के बाद पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा। पाकिस्तान ने कश्मीर को जबरन हड़पने की योजना बनाई। अपनी इस योजना के हिस्से के तौर पर पाकिस्तान ने कबायली पठानों को कश्मीर में घुसपैठ के लिए तैयार किया। कबायलियों की एक फौज ने 24 अक्टूबर, 1947 को सुबह में धावा बोल दिया।

महाराज हरि सिंह ने मुश्किल वक्‍त में भारत को याद किया और भारत ने भी मदद करने में पैर पीछे नहीं खींचे।

महाराजा हरि सिंह की तरफ से जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद पैदल सेना के दस्ते को हवाई जहाज से दिल्ली से श्रीनगर भेजा गया। इन पैदल सैनिकों के जिम्मे पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कश्मीर में घुसपैठ करने वाले आक्रमणकारी कबायलियों से लड़ना और कश्मीर को उनसे मुक्त कराना था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आक्रमणकारियों के खिलाफ यह पहला सैन्य अभियान था।

हमलावर कबायलियों की संख्या करीब 5,000 थी और उनको पाकिस्तान की सेना का पूरा समर्थन हासिल था। कबायलियों ने एबटाबाद से कश्मीर घाटी पर हमला किया था। भारतीय पैदल सैनिकों ने आखिरकार कश्मीर को कबायलियों के चंगुल से 27 अक्टूबर, 1947 को मुक्त करा लिया। चूंकि इस पूरे सैन्य अभियान में सिर्फ पैदल सेना का ही योगदान था, इसलिए इस दिन को भारतीय थल सेना के पैदल सैनिकों की बहादुरी और साहस के दिन के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया।

1947 की उस जंग में कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन भी शामिल थी। कुमाऊं रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे सम्‍मानित रेजिमेंट है। इसकी डी कंपनी का नेतृत्‍व करने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा को श्रीनगर एयरपोर्ट को बचाने के लिए परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था। मेजर सोमनाथ शर्मा शर्मा भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता बने। लांस नायक बाद में ओनरेरी कैप्टन कर्म सिंह 1सिख को भी अतुलनीय शौर्य और पराक्रम दिखाने के लिए दूसरा परमवीर चक्र प्रदान किया गया था।पैदल सेना भारतीय थल सेना की रीढ़ की हड्डी के समान है। इसको ‘क्वीन ऑफ द बैटल’ यानी ‘युद्ध की रानी’ कहा जाता है।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!