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मथुरा रामलीला में जानकी जन्म ,ताड़का वध, अहिल्या उद्धार की लीला का मंचन।

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रिपोर्ट यज्ञदत्त चतुर्वेदी, मथुरा उत्तर प्रदेश 

• मथुरा रामलीला में जानकी जन्म ,ताड़का वध, अहिल्या उद्धार की लीला का मंचन।

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मथुरा : श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा के लीला मंच पर जानकी जन्म, ताड़का वध व अहिल्या उद्धार का प्रभावशाली व हृदयस्पर्शी मंचन किया गया ।मिथिला (जनकपुर) में वर्षा न होने से अकाल की स्थिति हो गयी है । प्रजा कष्ट में दुर्भिक्ष का सामना कर रही है । राजा जनक अपने मंत्री को खगोल शास्त्र व ज्योतिश शास्त्र के मर्मज्ञों को निमंत्रित करने की आज्ञा देते हैं । शतानन्द व गर्गाचार्य आदि ऋषियों की सलाह पर राजा जनक व महारानी सुनयना एक अनुष्ठान के तहत सोने के हल को अपने कंधों पर रख कर भूमि का छेदन करते हैं । कुछ दूर जाकर हल भूमि में अठक जाता है । जानकी जी अनादि पराशक्ति के रूप में प्रकट होती हैं । वर मांगने को कहती हैं । राजा जनक व सुनयना उनसे परात्पर रूप का त्याग करके शिशु के रूप में स्थिर होकर अभीष्ट सुख प्रदान करने की इच्छा प्रकट करते हैं । जानकी जी छोटी बालिका के रूप में परिणित हो जाती हैं । राजा जनक व सुनयना उनको अपनी गोद में उठाकर हृदय से लगा लेते है मिथिला में आनन्द होने लगा।दूसरी ओर राजर्षि विश्वामित्र राक्षसों द्वारा यज्ञ आदि अनुष्ठान को नष्ट करने से अत्यन्त दुःखी थे । अवध नरेश दशरथ के यहाॅं पहुंचते हैं एवं राक्षसों के उपद्रव से मुक्ति व यज्ञ रक्षा के लिए अपने साथ श्री राम व लक्ष्मन को ले जाने की कहते हैं । राजा दशरथ यह कहते हुए कि मेरे परम किशोर अवस्था वाले पुत्र अत्यंत क्रूर राक्षसों का सामना कैसे कर पायेंगे, मना करते हैं । मुनि वशिष्ठ के धैर्य धारण कराने पर दशरथ दोनों राजकुमारों को उन्हें सौंप देते हैं ।

मार्ग में दस हजार हाथियों का बल रखने वाली क्रूर निश्चरी ताड़का का वध करने के उपरांत आश्रम में पहुंचते ही मुनि विश्वामित्र ने श्रीराम को संग्रहित शस्त्र विद्या का ज्ञान, बला, अतिबला के मंत्र व शस्त्र समर्पित किये । यज्ञ में विघ्न डालने वाले मारीच, सुबाहु आदि निशिचरों का श्रीराम नाश कर देते हैं । मार्ग में एक निर्जन आश्रम में अबला आकार की शिला के बारे में राम के पूंछने पर मुनि बताते हैं कि यह महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या हैं । इन्हें पशु पक्षियों से विहीन निर्जन वन में पड़े रहने का श्राप है । राम इसको अपने चरण कमलों से स्पर्श कीजिए । चरण स्पर्श से अहिल्या अपने पूर्व रूप में प्रकट हो जाती है ।

जनकपुर से मुनि विश्वामित्र के पास दूत आकर उनको जनकपुर में हो रहे धनुष यज्ञ में निमंत्रित करता है । मुनि, राम व लक्ष्मण को धनुष यज्ञ में चलने को कहते हैं।विश्वामित्र राम व लक्ष्मन के साथ जनकपुर की सीमा में प्रवेश करते हैं । वाटिका का माली राजा जनक को इसकी सूचना देता है । वाटिका पहुंच कर राजा जनक उनका स्वागत करते हैं । जनक के आग्रह पर विश्वामित्र राम व लक्ष्मण का परिचय कराते हैं ।

रात्रि में जन्मस्थान पर लीला मंचन से पूर्व सायंकाल मुनि विश्वामित्र के साथ राम, लक्ष्मण की सवारी जन्मस्थान से प्रारम्भ होकर डीग गेट, चैक बाजार, होती हुयी राजाधिराज बाजार पहुंची । वहाॅ श्रीराम के द्वारा ताड़का वध की लीला सम्पन्न हुई । प्रसाद व्यवस्था गो0 गोविन्द सजावट वालों की स्मृति में गौरव अग्रवाल, रोहित अग्रवाल सजावट वाले द्वारा की गयी ।

लीला प्रदर्शन के समय गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी, जयन्ती प्रसाद अग्रवाल, नन्दकिशोर अग्रवाल, मूलचन्द गर्ग, प्रदीप सर्राफ पी.के., विजय सर्राफ किरोड़ी, अजय मास्टर, पं0 शशांक पाठक, विनोद सर्राफ, संजय बिजली, सुरेन्द्र शर्मा खौना, अजय अग्रवाल, अनूप टैण्ट, राजीव शर्मा, दिनेश सदर, बांकेलाल घुंघुरू वाले, राजनारायण गौड, डा0 कुलदीप अग्रवाल, गोवर्धन दास नीनू, संजय किरोड़ी, ़ हिमांशु सूतिया, अर्चन आदि प्रमुख थे । व्यवस्था में सहयोग मोहन लाल कंठीमाला वालो, गुड्डू आदि का विशेष रूप से रहा । 01 अक्टूवर मंगलवार को 7 बजे श्री कृष्ण जन्मस्थान लीलामंच पर गौरी पूजन, पुष्प वाटिका (अष्टसखी संवाद) की लीला होगी ।

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