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अफसरनामा। ये कहानी है उत्तराखंड के जिला सितारगंज के रहने वाले आईएएस अधिकारी हिमांशु गुप्ता (IAS Officer Himanshu Gupta) की. हिमांशु गुप्ता आईएएस, सभी सिविल सेवा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत हैं

अंकुर कुमार पाण्डेय
रिपोर्ट सत्यार्थ न्यूज वाराणसी
अफसरनामा। ये कहानी है उत्तराखंड के जिला सितारगंज के रहने वाले आईएएस अधिकारी हिमांशु गुप्ता (IAS Officer Himanshu Gupta) की. हिमांशु गुप्ता आईएएस, सभी सिविल सेवा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत हैं क्यूंकि गरीबी और कई कठिनाइयों के होने के बावजूद इन्होने कभी हार नहीं मानी, सबका डट का सामना किया और अंत में कड़ी मेहनत करके यूपीएससी में सफलता हासिल की. हिमांशु गुप्ता के सक्सेस की संघर्ष भरी स्टोरी नीचे पढ़ें.

उत्तराखंड के सितारगंज जिले के रहने वाले हिमांशु गुप्ता बचपन से ही होशियार और पढाई- लिखाई में थे. आर्थिक स्थिति सही न होने के कारण उनका बचपन आम बच्चों से बिलकुल ही अलग था और उन्होंने अपना बचपन अत्यधिक गरीबी में बिताया. 2019 में उन्होंने परीक्षा पास की और 309वीं रैंक हासिल की। वह अपने आखिरी प्रयास में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हुए और आखिरकार 2020 में अखिल भारतीय 139 रैंक के साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी बन गए। 2023 में, उन्हें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के नए सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। चाय बेचने से IAS बनने तक… आपकी सोच बदल देगी ये कहानी जुलाई 2024 में यूपीएससी प्रीलिम्स की परीक्षा होनी है. ऐसे में खुद को मोटिवेट रखने के लिए इस कठिन परीक्षा को निकाल चुके कैंडिडेट्स की स्टोरी पढ़नी चाहिए. चाय बेचने वाले हिमांशु गुप्ता की कहानी भी आज हर उस उम्मीदवार के लिए मोटिवेशन है जो कठिन परिस्थितियों में एग्जाम ड्रॉप करने का प्लान बना लेते हैं अगर मन में कुछ कर गुजरने की लगन हो तो आप किसी भी मुकाम तक पहुंच सकते हैं. अक्सर लोग कहते हैं कि जिसके पास कोचिंग में खर्च करने के लिए अच्छे-खासे पैसे हैं वही, आईएएस बन पाते हैं. गरीबी से जूझ रहे या कम पैसों में चल रहे घर के बेटे के लिए यह करना मुश्किल है. असल में ऐसा नहीं है और यह साबित किया है मजदूर के बेटे हिमांशु गुप्ता ने, जो खुद एक चायवाले थे लेकिन आज एक आईएएस ऑफिसर है. हिमांशु गुप्ता की कहानी हर उस उम्मीदवार को प्रेरित करती है जो परेशानियों और कठनाइयों के बीच पढ़ाई छोड़ने का सोचते हैं.

 

 

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