Advertisement

भव्य जिनेश्वरी दीक्षा पट्टाचार्य आचार्य विशुद्ध सागर महामुनि के सानिध्य में

भव्य जिनेश्वरी दीक्षा पट्टाचार्य आचार्य विशुद्ध सागर महामुनि के सानिध्य में

शहर में ऐतिहासिक आयोजन हुआ*
टीकमगढ़ म प्र से कविन्द पटैरिया पत्रकार
टीकमगढ़। शहर के मध्य स्थित महावीर जिनालय में 14 अप्रैल से 20 अप्रैल 2026 तक चल रहे श्रीमद जिनेंद्र पंचकल्याणक श्री 1008 शांतिनाथ जिनबिम्ब प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत नगर में धार्मिक उत्साह चरम पर है। यह संपूर्ण आयोजन पट्टाचार्य आचार्य विशुद्ध सागर महामुनि राज के सानिध्य में सम्पन्न हो रहा है।

धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि

17 अप्रैल
2026 को प्रातः 8.30बजे भव्य जिनेश्वरी दीक्षा समारोह आयोजित हुआ। इस अवसर पर ब्रह्मचारी राजीव भैया (टीकमगढ़), आदेश भैया (टेहरका) एवं विकास गांधी (पुणे, महाराष्ट्र) एवं छुल्लक विछोर सागर जी ने भी मुनि दीक्षा ली यह कार्यक्रम त्याग और तपस्या का अद्भुत उदाहरण हुआ जिसे देखने के लिए देशभर से श्रद्धालुओं आए हुए हैं

यह आयोजन टीकमगढ़ के धार्मिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण एवं स्मरणीय अध्याय के रूप में दर्ज हुआ
जैन समाज में जिनेश्वरी दीक्षा एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार है। इसे आत्मा की सर्वोच्च साधना की शुरुआत माना जाता है। सरल शब्दों में दीक्षा वह प्रक्रिया है जब एक व्यक्ति सांसारिक जीवन (गृहस्थ अवस्था) को छोड़कर त्याग, तप और साधना वाले मुनि जीवन में प्रवेश करता है।
जिनेश्वरी दीक्षा
वह पवित्र अवसर है जब कोई साधक मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक या क्षुल्लिका बनने का संकल्प लेता है। दीक्षा लेने वाला व्यक्ति भगवान जिनेंद्र की वाणी और जैन धर्म के नियमों को पूरी तरह अपनाने का व्रत लेता है।
जिनेश्वरी दीक्षा की मुख्य विशेषताएँ
सांसारिक मोह-माया का त्याग
दीक्षा लेने वाला व्यक्ति
परिवार,
धन-दौलत,
भौतिक सुख
सामाजिक पहचान
को छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग अपनाता है।
पंच महाव्रतों का पालन
दीक्षा के बाद साधु-साध्वी पाँच महाव्रतों का आजीवन पालन करते हैं—
अहिंसा
सत्य
अस्तेय
ब्रह्मचर्य
अपरिग्रह (संपत्ति का त्याग)
केश लोचन (बाल त्याग)
दीक्षा समारोह में साधक अपने सिर के बालों का हाथों से केश लोचन करते है, जो त्याग का प्रतीक है।
दीक्षा संस्कार का आयोजन

दीक्षा समारोह में आशीर्वाद, उपदेश, संगीतमय कार्यक्रम और गुरु भक्ति के साथ विधिपूर्वक प्रक्रिया संपन्न होती है।
मुनि जीवन की शुरुआत
दीक्षा के बाद साधक—
भूमि-शयन
अहारचरिया
निरंतर स्वाध्याय
तप और ध्यान
संयमपूर्ण जीवन
पालन करता है।
इस दीक्षा का महत्व
जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की दिशा में पहला कदम
चरम आत्मिक शांति और साधना का मार्ग
भगवान महावीर के रास्ते पर चलने का संकल्प
सरल शब्दों में
जिनेश्वरी दीक्षा वह पवित्र क्षण है जब साधक अपना पूरा सांसारिक जीवन छोड़कर संयम, तप और मोक्ष के रास्ते पर चलने का दृढ़ निश्चय करता है।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा की पंचम गति के लिए मात्र एक ही भेष होता है वह दिगंबर मुद्रा होती है यह पंचम काल का चमत्कार है कि लोग रत्नत्रय को धरण कर रहे हैं ,वह,पुरुष धन्य है जिनकी संतान आज भगवान बनने के लिए यहां आई हैं यही श्रवण संस्कृति है इन मुनि राज को 28 मूल गुणौ का पालन करना पड़ता है अब इन मुनी राज के नाम होंगे सकराल सागर जी सुबोध सागर जी सुप्रभात सागर जी एवं , प्रसन्न सागर जी
अभी तक विशुद्ध सागर जी महाराज ने 74 दीक्षा दी थी टीकमगढ़ में चार दीक्षा देने के बाद अब 78 दीक्षा दे चुके हैं
और अंत में आचार्य श्री ने कहा की टीकमगढ़ समाज ने हमें बच्चों की तरह संभाला है मैं 17 वर्षों की उम्र से था तब से यह समाज मुझे संभाले हुए हैं मुनि के दो चश्मे होते हैं एक समाज और दूसरा विद्वान टीकमगढ़ मध्य भारत की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि अभी तक महाराज आयत होता था अब निर्यात भी हो रहा है
क्योंकि टीकमगढ़ में भी दीक्षा होने लगी है इस आयोजन में हजारों की संख्या में लोग दर्शक बने

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!