कटनी में छठ महापर्व का भव्य समापन: आस्था का अनुपम सागर उमड़ा, श्रद्धालुओं ने सूर्योदय के साथ पूरी की कठिन तपस्या

कटनी। मध्य प्रदेश के कटनी जिले में लोक आस्था के सबसे बड़े पर्व छठ महापर्व का समापन मंगलवार सुबह उगते सूर्य को प्रथम अर्घ्य अर्पित करने के साथ विधिपूर्वक संपन्न हुआ। शहर के प्रमुख घाटों – बाबाघाट, छपरवाह, और तट पर सुबह चार बजे से ही श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। सूर्योदय के साथ ही हजारों व्रतियों ने जल में खड़े होकर सूर्यदेव को दूध, फल और ठेकुआ से भरे डालों का अर्घ्य अर्पित किया। पारंपरिक छठ गीतों की मधुर धुनों से घाट गूंज उठे, जबकि वातावरण में भक्ति, उत्साह और एकता का अनुपम संगम देखने को मिला।
चार दिवसीय कठिन व्रत की चरम पराकाष्ठा
छठ महापर्व, जिसे सूर्य षष्ठी या डाला छठ भी कहा जाता है, चार दिनों की कठोर साधना का पर्व है। इसकी शुरुआत *नहाय-खाय* से होती है, जिसमें व्रती नदियों या तालाबों में स्नान कर शुद्ध होकर कद्दू-भात और चने की दाल का सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन *खरना* में पूरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और फलों का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। तीसरे दिन *संध्या अर्घ्य* के लिए डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जिसमें ठेकुआ, लड्डू, मौसमी फल (केला, नारियल, सेब, सिंहाड़ा) और गन्ने की पूजा की जाती है। अंतिम दिन *उषा अर्घ्य* में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे से अधिक का निर्जला व्रत तोड़ा जाता है।

इस वर्ष कटनी में व्रतियों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक रही। महिलाओं के साथ-साथ पुरुष और युवा भी बड़ी संख्या में व्रत रखते दिखे। कई परिवारों ने तो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरा को निभाते हुए बच्चों को भी पूजा में शामिल किया।
घाटों पर भक्ति का अद्भुत दृश्य
– *बाबाघाट: कटनी का सबसे व्यस्त घाट। सुबह 5 बजे से ही यहां 10 हजार से अधिक श्रद्धालु एकत्रित हो चुके थे। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती-कुर्ता में सजकर डाले सिर पर रखे नदी में उतरीं। पारंपरिक गीत जैसे *”केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय चढ़ल हो” और “उगु न सुरुज देव, भइल बिहानिया” से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो गया। बच्चों ने गुब्बारे और झंडियां लहराते हुए उत्सव को और रंगीन बनाया।
– *छपरवाह घाट*: यहां नर्मदा नदी के किनारे सैकड़ों महिलाओं की टोलियां एक साथ खड़ी होकर अर्घ्य दे रही थीं। कई व्रतियों ने 3-4 दिन से अन्न-जल त्याग रखा था। एक वृद्ध महिला रामप्यारी देवी (72 वर्ष) ने बताया, “40 साल से छठ मइया का व्रत रख रही हूं। पिछले साल बेटे की नौकरी लगी, इस बार पोते की पढ़ाई के लिए मांगा है।”
प्रशासन की मुस्तैदी और सुरक्षा व्यवस्था
कटनी जिला प्रशासन ने पर्व को शांतिपूर्ण बनाने के लिए विशेष इंतजाम किए।
– 500 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहे।
– घाटों पर अस्थायी चेंजिंग रूम, पेयजल और शौचालय की व्यवस्था की गई।
– नावों से नदी की निगरानी और गोताखोरों की टीम तैनात रही।
– स्वास्थ्य विभाग की एम्बुलेंस और चिकित्सा दल मौजूद रहे।
जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक स्वयं घाटों का निरीक्षण करते दिखे। नगर पालिका ने घाटों की सफाई और लाइटिंग की विशेष व्यवस्था की।

प्रवासी समुदाय की सक्रियता और सामाजिक एकता
कटनी में छठ पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी मजदूरों और व्यापारियों द्वारा मनाया जाता है। लेकिन पिछले एक दशक में यह स्थानीय मध्य प्रदेशी परिवारों में भी लोकप्रिय हो गया है। बाबाघाट पर आयोजित सामूहिक पूजा में हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भी प्रसाद ग्रहण करने पहुंचे, जो सामाजिक सौहार्द का उत्कृष्ट उदाहरण बना।
ठेकुआ और प्रसाद की खुशबू
घाटों के आसपास ठेकुआ बनाने की भट्टियां सुबह से धधक रही थीं। गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बने ठेकुआ की महक दूर तक फैली थी। कई परिवारों ने सैकड़ों किलो ठेकुआ बनवाकर गरीबों और राहगीरों में बांटा। फल विक्रेताओं और पूजा सामग्री की दुकानों पर खरीदारी का तांता लगा रहा।
व्रतियों की मनोकामनाएं
– *संतान प्राप्ति*: कई नवविवाहित जोड़े पहली बार व्रत रख रहे थे।
– *परिवार की सुरक्षा*: रेलवे और खदान कर्मचारी अधिकांशतः सुरक्षा की कामना कर रहे थे।
– *आर्थिक समृद्धि*: व्यापारी वर्ग ने व्यापार वृद्धि की प्रार्थना की।
– *स्वास्थ्य*: बीमार परिजनों के लिए आरोग्य की कामना प्रमुख रही।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस बार कई सामाजिक संगठनों ने “प्लास्टिक मुक्त छठ” का अभियान चलाया। व्रतियों को बांस की टोकरी और मिट्टी के दीये इस्तेमाल करने की अपील की गई। नदी में प्लास्टिक न फेंकने के लिए जागरूकता बोर्ड लगाए गए।
#### समापन और पारण
सूर्योदय के बाद व्रतियों ने पारण किया। सबसे पहले अदरक वाली चाय और खीर-पूरी का प्रसाद ग्रहण किया गया। इसके बाद परिवार के साथ घर लौटकर पूजा सामग्री को नदी में विसर्जित किया गया।
कटनी में छठ महापर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आस्था की डोर कितनी मजबूत होती है। निर्जला उपवास, कठिन नियम और सामूहिक उत्साह के बीच यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया। अगले वर्ष कार्तिक शुक्ल षष्ठी (2026) में फिर यही आस्था का सागर उमड़ेगा, जिसमें कटनी की मिट्टी एक बार फिर भक्ति की सुगंध से महक उठेगी।
*छठ मइया की जय! सूर्यदेव की जय!*

















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