कटनी को मेडिकल कॉलेज: जनता की मांग के साथ छलावा?
हरिशंकर पाराशर सत्यार्थ न्यूज़ संवाददाता

कटनी: कटनी की जनता की वर्षों पुरानी मांग, एक सरकारी मेडिकल कॉलेज, अधूरी रह गई। जबलपुर, सागर, शहडोल और रीवा जैसे शहरों को सरकारी मेडिकल कॉलेज मिले, लेकिन कटनी को केवल पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल का कॉलेज थमा दिया गया। यह कॉलेज भले ही मेडिकल कॉलेज के नाम से जाना जाए, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह निजी कंपनियों का कारोबार बनकर रह गया है।
सोमवार को जबलपुर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में इस पीपीपी मॉडल के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। बीजेपी नेताओं ने इसे कटनी के लिए ऐतिहासिक कदम बताकर खूब वाहवाही बटोरी। तस्वीरें खिंचवाईं, ढोल-ढमाके किए और राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ मचाई। लेकिन कटनी की जनता इसे उत्सव नहीं, बल्कि अपने साथ छलावा मान रही है।
स्थानीय निवासी सवाल उठा रहे हैं कि कटनी के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? क्या कटनीवासी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं, जिन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज के बजाय निजी मॉडल से संतोष करना पड़ेगा? पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाला यह कॉलेज शायद चमक-दमक से लैस हो, लेकिन इलाज और पढ़ाई की लागत गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से बाहर होगी।
कटनी के पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, शहर जिला कांग्रेस कमेटी, राजा जगवानी ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “बीजेपी और स्थानीय नेता जनता की असली मांग को दबाकर केवल दिखावटी जश्न मना रहे हैं। यह मेडिकल कॉलेज जनता का नहीं, बल्कि निवेशकों का धंधा बनकर रह जाएगा।” उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।
कटनी की जनता ने स्पष्ट शब्दों में अपनी मांग दोहराई है—वे सरकारी मेडिकल कॉलेज चाहते हैं, न कि महंगा इलाज देने वाला पीपीपी मॉडल। यदि सरकार इस मांग को अनसुना करती है, तो यह मेडिकल कॉलेज बीजेपी के लिए राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जनता के गुस्से का प्रतीक बन सकता है।
*प्रेषक*: राजा जगवानी, पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, शहर जिला कांग्रेस कमेटी, कटनी, मध्य प्रदेश
















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