उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: एनडीए बनाम इंडिया गठबंधन, संख्याबल, क्रॉस-वोटिंग और रणनीति की महायुद्ध
हरिशंकर पाराशर, नई दिल्ली, 20 अगस्त 2025

देश के उपराष्ट्रपति पद के लिए 9 सितंबर 2025 को होने वाला चुनाव राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाए हुए है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार घोषित किया है, जबकि इंडिया गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को मैदान में उतारा है। यह चुनाव न केवल संख्याबल की कसौटी है, बल्कि गठबंधनों की एकजुटता, क्षेत्रीय समीकरणों और क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं का भी रोमांचक मंच बनने जा रहा है। दोनों गठबंधन अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, जबकि गैर-गठबंधन दलों की भूमिका इस बार निर्णायक साबित हो सकती है।
संसद में संख्याबल का गणित
उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों द्वारा किया जाता है। वर्तमान में संसद में कुल 790 सांसद हैं (लोकसभा: 543, राज्यसभा: 247, कुछ सीटें रिक्त)। जीत के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 396 वोटों की आवश्यकता होगी। दोनों गठबंधनों का संख्याबल इस प्रकार है:
– *एनडीए का संख्याबल*: एनडीए के पास लोकसभा में 293 और राज्यसभा में 112 सांसद हैं, जो कुल मिलाकर 405 वोट बनाते हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के 240 लोकसभा और 86 राज्यसभा सांसद इस गठबंधन की रीढ़ हैं। इसके अलावा, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी, 16 लोकसभा), जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू, 12 लोकसभा), शिवसेना (7 लोकसभा), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (5 लोकसभा), और अन्य छोटे सहयोगी दल एनडीए की ताकत बढ़ाते हैं। यह आंकड़ा बहुमत से 9 वोट अधिक है, जो एनडीए को मजबूत स्थिति में रखता है।
– *इंडिया गठबंधन का संख्याबल*: इंडिया गठबंधन के पास लोकसभा में 234 और राज्यसभा में 85 सांसद हैं, जो कुल 319 वोट बनाते हैं। इसमें कांग्रेस (99 लोकसभा, 26 राज्यसभा), समाजवादी पार्टी (37 लोकसभा, 3 राज्यसभा), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके, 22 लोकसभा, 10 राज्यसभा), तृणमूल कांग्रेस (29 लोकसभा, 13 राज्यसभा), और अन्य सहयोगी दल जैसे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी, 4 लोकसभा, 6 राज्यसभा) शामिल हैं। यह आंकड़ा बहुमत से 77 वोट कम है, जिसके लिए इंडिया गठबंधन को गैर-गठबंधन दलों का समर्थन जुटाना होगा।
क्रॉस-वोटिंग और अनुपस्थिति का जोखिम
उपराष्ट्रपति चुनाव में व्हिप लागू नहीं होता, जिसके कारण सांसद अपनी अंतरात्मा के आधार पर मतदान कर सकते हैं। इस स्थिति में क्रॉस-वोटिंग और सांसदों की अनुपस्थिति परिणाम को अप्रत्याशित बना सकती है।
– *एनडीए की चुनौतियां*: एनडीए का संख्याबल फिलहाल मजबूत है, जिससे सी.पी. राधाकृष्णन की जीत की संभावना प्रबल दिखती है। हालांकि, यदि टीडीपी, जेडीयू या अन्य सहयोगी दलों के 10-15 सांसद क्रॉस-वोटिंग करते हैं या मतदान से अनुपस्थित रहते हैं, तो एनडीए का आंकड़ा 390 के आसपास आ सकता है, जो बहुमत से कम होगा। बीजेपी के लिए अपने सहयोगी दलों को एकजुट रखना और अनुशासन सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रीय दलों में असंतोष या क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर सांसदों का रुख बदल सकता है।
– *इंडिया गठबंधन की रणनीति*: इंडिया गठबंधन को जीत के लिए 77 अतिरिक्त वोट चाहिए। इसके लिए गठबंधन की नजर बीजू जनता दल (बीजेडी, 9 लोकसभा, 8 राज्यसभा), वाईएसआर कांग्रेस (4 लोकसभा, 11 राज्यसभा), और अन्य निर्दलीय सांसदों पर है। यदि ये दल इंडिया गठबंधन का समर्थन करते हैं, तो उसका आंकड़ा 350 के करीब पहुंच सकता है। इसके अलावा, एनडीए के कुछ असंतुष्ट सांसदों, विशेषकर जेडीयू या टीडीपी जैसे दलों से, को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस और अन्य सहयोगी दल दक्षिण भारत में अपनी क्षेत्रीय अपील का लाभ उठाने की योजना बना रहे हैं।
क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरण
इंडिया गठबंधन ने बी. सुदर्शन रेड्डी के चयन के साथ दक्षिण भारत, खासकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपनाई है। रेड्डी का सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के रूप में सम्मानित करियर और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के सांसदों को लुभाने में मददगार साबित हो सकती है। हालांकि, टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के लिए यह फैसला जटिल है। रेड्डी को समर्थन देने से उनकी क्षेत्रीय साख बढ़ सकती है, लेकिन एनडीए के साथ गठबंधन की प्रतिबद्धता को तोड़ना दिल्ली में उनकी स्थिति को कमजोर कर सकता है। वाईएसआर कांग्रेस भी इस चुनाव में तटस्थ रहने या सौदेबाजी की रणनीति अपना सकती है।
दूसरी ओर, सी.पी. राधाकृष्णन का लंबा राजनीतिक अनुभव, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से गहरा नाता, और तमिलनाडु व महाराष्ट्र में उनके प्रशासनिक कार्यकाल का रिकॉर्ड एनडीए के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। उनकी उम्मीदवारी दक्षिण और पश्चिम भारत में बीजेपी की बढ़ती अपील को और मजबूत कर सकती है। खासकर तमिलनाडु में, जहां बीजेपी डीएमके और कांग्रेस के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है, राधाकृष्णन का चेहरा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
अन्य दलों की भूमिका
गैर-गठबंधन दलों और निर्दलीय सांसदों की भूमिका इस चुनाव में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस के अलावा, कुछ छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों (लगभग 20-25 वोट) का रुख महत्वपूर्ण होगा। बीजेडी ने अतीत में कई बार एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों का समर्थन किया है, जिसके कारण उसका रुख अनिश्चित है। वहीं, वाईएसआर कांग्रेस के लिए यह चुनाव क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का अवसर हो सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और रणनीति
उपराष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस-वोटिंग का इतिहास रहा है। 2017 में हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार एम. वेंकैया नायडू ने विपक्ष के गोपालकृष्ण गांधी को हराया था, लेकिन उस समय भी कुछ सांसदों ने क्रॉस-वोटिंग की थी। इस बार, इंडिया गठबंधन इस संभावना को भुनाने की कोशिश में है। गठबंधन के नेता क्षेत्रीय दलों के साथ गहन बातचीत कर रहे हैं और रेड्डी की उम्मीदवारी को एक गैर-राजनीतिक, सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में पेश कर रहे हैं।
वहीं, एनडीए अपनी एकजुटता और अनुशासन पर भरोसा कर रहा है। बीजेपी के रणनीतिकार सहयोगी दलों के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि कोई भी सांसद पाला न बदले। साथ ही, एनडीए गैर-गठबंधन दलों को अपने पक्ष में लाने के लिए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर सौदेबाजी की संभावना से इंकार नहीं कर रहा।
* निष्कर्ष
संख्याबल के हिसाब से एनडीए का पलड़ा भारी दिखता है, लेकिन क्रॉस-वोटिंग, अनुपस्थिति, और गैर-गठबंधन दलों की भूमिका इस चुनाव को अप्रत्याशित बना सकती है। यदि इंडिया गठबंधन बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, और एनडीए के कुछ असंतुष्ट सांसदों को अपने पक्ष में करने में सफल होता है, तो बी. सुदर्शन रेड्डी के लिए उपराष्ट्रपति भवन की राह खुल सकती है। दूसरी ओर, एनडीए की एकजुटता और रणनीतिक चतुराई सी.पी. राधाकृष्णन को जीत दिला सकती है। 9 सितंबर को होने वाला यह चुनाव न केवल संख्याबल की कसौटी होगा, बल्कि राजनीतिक रणनीति, गठबंधनों की एकजुटता, और क्षेत्रीय समीकरणों का भी निर्णायक मंच बनेगा।
(हरिशंकर पाराशर, नई दिल्ली ब्यूरो)

















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