भारत में कचरा प्रबंधन: UNICEF रिपोर्ट्स ने खोली पोल, सामाजिक-आर्थिक संकट का चेहरा उजागर
नई दिल्ली, 11 अगस्त 2025 – हरिशंकर पाराशर द्वारा

देश की तेज रफ्तार विकास यात्रा के बीच कचरा प्रबंधन एक ऐसी जटिल चुनौती बनकर उभरा है, जो न सिर्फ पर्यावरण को निगल रहा है, बल्कि लाखों जिंदगियों को भी दलदल में धकेल रहा है। UNICEF की ताजा रिपोर्ट्स इस समस्या को सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकट के रूप में चित्रित करती हैं, जहां रैगपिकर्स के रूप में काम करने वाले लाखों लोग – खासतौर पर बच्चे और हाशिए पर पड़े समुदाय – गरीबी, शोषण और स्वास्थ्य जोखिमों की चपेट में हैं। UNICEF की रिपोर्ट्स में साफ कहा गया है कि भारत में कचरा प्रबंधन केवल कचरे का संग्रहण और निपटान नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट है, जो बाल श्रम, जातिगत भेदभाव और आर्थिक असमानता से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या सर्कुलर इकोनॉमी के सपने को भी चूर-चूर कर सकती है, जहां 2050 तक 2 ट्रिलियन डॉलर का बाजार और करोड़ों नौकरियां दांव पर लगी हैं।

UNICEF की रिपोर्ट्स में यह भी जोर दिया गया है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इन ‘अदृश्य योद्धाओं’ – यानी रैगपिकर्स – की जिंदगी सुधारना जरूरी है, जो देश के 15-20% कचरे को रिसाइकल कर पर्यावरण को सांस लेने लायक बनाते हैं। लेकिन वास्तविकता कड़वी है: लाखों बच्चे और महिलाएं इस दलदल में फंसे हैं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की कोई जगह नहीं। UNICEF के विशेषज्ञों का कहना है, “यह न केवल एक पर्यावरणीय समस्या है, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा है, जहां हाशिए पर पड़े समुदायों को मुख्यधारा में लाने की सख्त जरूरत है।”
सफल मॉडल: मायनागुरी और थाने की कहानी, लेकिन स्केलिंग की चुनौती बाकी
UNICEF की रिपोर्ट्स में मायनागुरी (पश्चिम बंगाल) और थाने (महाराष्ट्र) जैसे स्थानीय मॉडलों को सफलता की मिसाल के रूप में पेश किया गया है, लेकिन इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की राह में कई बाधाएं हैं। मायनागुरी में UNICEF के सहयोग से स्थापित प्लास्टिक कचरा प्रबंधन (PWM) इकाई ने न केवल पर्यावरण को राहत दी है, बल्कि स्थानीय रोजगार भी पैदा किया है। यहां रोजाना 600 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा संभाला जाता है, जो सड़क निर्माण और रिसाइक्लिंग उत्पादों में इस्तेमाल होता है। सात कर्मचारी, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं, प्रति दिन 202 रुपये की मजदूरी पर काम करते हैं, और PPE किट्स से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। इसी तरह, थाने में सामर्थ भारत व्यासपीठ (SBV) प्रोजेक्ट ने 24 महिलाओं को सुरक्षित रोजगार दिया, जहां पहले वे डंपिंग ग्राउंड्स पर जान जोखिम में डालकर काम करती थीं। इस प्रोजेक्ट ने 1 लाख घरों में कचरा अलगाव को बढ़ावा दिया और रोजाना 30 टन कचरे को डंपिंग से रोका।

हालांकि, UNICEF की रिपोर्ट्स चेतावनी देती हैं कि ये मॉडल स्थानीय स्तर पर ही सीमित हैं। राष्ट्रीय स्तर पर स्केल करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश, जागरूकता अभियान और नीतिगत सुधार जरूरी हैं। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अगर ये पहलें पूरे देश में फैलाई गईं, तो लाखों अनौपचारिक श्रमिकों को औपचारिक रोजगार मिल सकता है, और कचरा संग्रहण दर 60% से बढ़कर 90% तक पहुंच सकती है। लेकिन क्रियान्वयन की कमी से ये सपने अधर में लटके हैं।
सरकार की भूमिका: योजनाएं मौजूद, लेकिन जमीनी हकीकत निराशाजनक
UNICEF की रिपोर्ट्स सरकार की योजनाओं की सराहना तो करती हैं, लेकिन क्रियान्वयन की कमियों पर उंगली भी उठाती हैं। स्वच्छ भारत मिशन (SBM) और जल जीवन मिशन में UNICEF तकनीकी साझेदार है, जिसके तहत 16 राज्यों में ODF Plus गांवों को बढ़ावा दिया जा रहा है। NAMASTE योजना के तहत सफाई कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा और कौशल विकास मिल रहा है, लेकिन UNICEF की आलोचना है कि लाखों अनौपचारिक रैगपिकर्स इससे बाहर हैं। रिपोर्ट्स में सुझाव दिया गया है कि सरकार को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर फोकस करना चाहिए, अनौपचारिक श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, और बाल श्रम उन्मूलन के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।

UNICEF के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 5-17 वर्ष के 12.9 मिलियन बच्चे श्रम में लगे हैं, जिनमें से लाखों रैगपिकिंग में शामिल हैं। स्वास्थ्य जोखिमों की बात करें, तो रैगपिकर्स को 30% अधिक खतरा है, जैसे संक्रमण, चोटें और श्वसन रोग। रिपोर्ट्स में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स की भी चर्चा है, जहां EPR के तहत कंपनियां निवेश कर रही हैं, लेकिन लाभ ग्राउंड लेवल पर नहीं पहुंच रहा। UNICEF सुझाव देती है कि कचरा अलगाव के लिए स्कूल-स्तरीय अभियान चलाए जाएं, बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाए, और सर्कुलर इकोनॉमी के लिए वित्तीय निवेश बढ़ाया जाए।
समाज की जिम्मेदारी: ‘अदृश्य योद्धाओं’ को सम्मान और समर्थन की दरकार
UNICEF की रिपोर्ट्स का सबसे मार्मिक हिस्सा है समाज की भूमिका पर जोर। ये रैगपिकर्स, जो 15-20% कचरे को रिसाइकल करते हैं, समाज में ‘अशुद्ध’ काम करने वाले के रूप में कलंकित हैं। रिपोर्ट्स कहती हैं कि समाज को इन ‘अदृश्य योद्धाओं’ को सम्मान देना चाहिए, क्योंकि वे पर्यावरण के असली रक्षक हैं। गरीबी, जातिगत भेदभाव और प्रवासन जैसे कारणों से फंसे इन समुदायों – दलित, ओबीसी, मुस्लिम और आदिवासी – को मुख्यधारा में लाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

अंत में, UNICEF की रिपोर्ट्स एक चेतावनी हैं: अगर सरकार, समाज और नीतियां एकजुट नहीं हुईं, तो कचरा प्रबंधन का संकट और गहरा जाएगा। लेकिन सकारात्मक पहलुओं जैसे मायनागुरी और थाने के मॉडल से उम्मीद बंधती है कि एक सतत, न्यायपूर्ण भविष्य संभव है। अब समय आ गया है कि वादों को अमल में बदला जाए, ताकि लाखों जिंदगियां कचरे की दलदल से निकल सकें।
(हरिशंकर पाराशर एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो सामाजिक अन्याय पर लिखते हैं। यह लेख UNICEF की आधिकारिक रिपोर्ट्स, सरकारी आंकड़ों और संबंधित अध्ययनों पर आधारित मूल विश्लेषण है, और कॉपीराइट नियमों का पालन करते हुए प्रकाशन हेतु तैयार किया गया है। स्रोतों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए UNICEF की वेबसाइट और सरकारी पोर्टल्स का संदर्भ लिया गया है।)
















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