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ढीमरखेड़ा की बदहाली: सड़क के अभाव में सड़क पर ही प्रसव, जच्चा-बच्चा की जान जोखिम में

ढीमरखेड़ा की बदहाली: सड़क के अभाव में सड़क पर ही प्रसव, जच्चा-बच्चा की जान जोखिम में

कटनी, 11 अगस्त 2025

आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा विकासखंड में बुनियादी सुविधाओं की कमी आदिवासी समुदाय के लिए अभिशाप बनी हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की अनुपस्थिति ने एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है। बीते रविवार को ढीमरखेड़ा तहसील के गौरी गांव में एक गर्भवती महिला को सड़क के अभाव में जननी वाहन की सुविधा न मिलने के कारण सड़क पर ही बच्ची को जन्म देना पड़ा। यह घटना न केवल प्रशासन की उदासीनता को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं की बदहाली की कड़वी सच्चाई को भी सामने लाती है।

सड़क पर जन्मी नवजात बच्ची
जानकारी के अनुसार, ढीमरखेड़ा तहसील के गौरा ग्राम पंचायत के आश्रित गांव गौरी निवासी मुन्ना गौंड की पत्नी कुसुम बाई (30 वर्ष) को रविवार सुबह प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने तत्काल 108 जननी वाहन सेवा को सूचित किया, लेकिन गौरी गांव तक पहुंचने वाली सड़क की स्थिति इतनी दयनीय थी कि वाहन गौरा गांव से करीब दो किलोमीटर पहले ही दलदल और दुर्गम रास्ते में फंस गया। गांव तक पक्की सड़क का अभाव होने के कारण परिजनों को कुसुम बाई को ‘झोली’ (कपड़े से बनी अस्थायी स्ट्रेचर) में लादकर पहाड़ी रास्ते से नीचे लाना पड़ा। इस कठिन और जोखिम भरे सफर के दौरान रास्ते में ही कुसुम बाई का प्रसव हो गया, और उन्होंने सड़क पर ही एक बच्ची को जन्म दिया।

स्थानीय आशा कार्यकर्ता शशिप्रभा विश्वकर्मा और समाजसेवी दुर्गेश विश्वकर्मा ने तत्परता दिखाते हुए मोटरसाइकिल से जच्चा और बच्ची को जननी वाहन तक पहुंचाया। इसके बाद दोनों को सिलौंड़ी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उनकी स्थिति स्थिर बताई जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर किया है।

ग्रामीणों का आक्रोश: सड़क की मांग अनसुनी
गौरी गांव के निवासियों का कहना है कि वे लंबे समय से पक्की सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगें प्रशासन के कानों तक नहीं पहुंचीं। बारिश के मौसम में गौरा से गौरी तक का रास्ता कीचड़ और दलदल से भरा होता है, जिससे न केवल गर्भवती महिलाओं, बल्कि अन्य मरीजों को भी अस्पताल पहुंचने में भारी कठिनाई होती है। ग्रामीण रामदास गौंड ने बताया, “हम कई बार पंचायत और तहसील कार्यालय में सड़क की मांग कर चुके हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है। बारिश में यह रास्ता जानलेवा बन जाता है।”

ग्रामीणों ने बताया कि गौरी जैसे कई गांव आज भी पुराने जमाने की तरह ‘झोली’ में मरीजों को ढोने के लिए मजबूर हैं। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलने से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा हो सकता है।

प्रशासनिक दावों की पोल खुली
प्रशासन और सरकार भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं के विस्तार के दावे कर रही हो, लेकिन ढीमरखेड़ा जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र इन दावों की सच्चाई को नकारते हैं। मध्य प्रदेश सरकार की ‘जननी सुरक्षा योजना’ और ‘108 एम्बुलेंस सेवा’ का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को सुरक्षित प्रसव सुविधा प्रदान करना है, लेकिन सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में ये योजनाएं प्रभावी नहीं हो पा रही हैं।

स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सिलौंड़ी के एक चिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सड़क की कमी के कारण कई बार मरीजों को समय पर अस्पताल लाना मुश्किल हो जाता है। “हमारे पास संसाधन सीमित हैं, और अगर मरीज समय पर नहीं पहुंचते, तो स्थिति और जटिल हो जाती है,” उन्होंने कहा।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
ढीमरखेड़ा जैसे क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक विकास को भी बाधित करता है। गौरी गांव जैसे क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और बाजार तक पहुंच भी सीमित है, क्योंकि खराब सड़कें हर क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। आदिवासी समुदाय, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित है, इन समस्याओं से सबसे अधिक प्रभावित होता है।

समाधान की दिशा में कदम”
इस घटना ने एक बार फिर प्रशासन को तत्काल कार्रवाई के लिए मजबूर किया है। ग्रामीणों ने मांग की है कि गौरी गांव तक पक्की सड़क का निर्माण तुरंत शुरू किया जाए। इसके साथ ही, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए स्थानीय स्तर पर मोबाइल मेडिकल यूनिट्स और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की तैनाती जरूरी है।

जिला प्रशासन को चाहिए कि वह ढीमरखेड़ा तहसील के सभी गांवों का सर्वे कर सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति का आकलन करे। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। सामाजिक कार्यकर्ता दुर्गेश विश्वकर्मा ने कहा, “अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो ऐसी घटनाएं बार-बार होंगी। यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की बदहाली का प्रतीक है।”

निष्कर्ष: एक जागरूक समाज की जरूरत
गौरी गांव की यह घटना केवल ढीमरखेड़ा की नहीं, बल्कि पूरे देश में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की स्थिति को दर्शाती है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी अगर एक गर्भवती महिला को सड़क पर बच्चा जन्म देना पड़ता है, तो यह हमारी विकास यात्रा पर एक गंभीर सवाल है। प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करने के साथ-साथ समाज को भी जागरूक होकर अपनी मांगों को मजबूती से उठाना होगा। केवल सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं ही नहीं, बल्कि एक समग्र विकास मॉडल की जरूरत है, जो ग्रामीण भारत को सशक्त बनाए और ऐसी त्रासदियों को रोके।

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