बलिदान – 4 अक्टूबर 1968
आज़ बलिदान दिवस है महावीर चक्र से सम्मानित कैप्टन बाबा हरभजन सिंह नाथुला के रक्षक
23वीं पंजाब रेजिमेंट
पलवल-04 अक्टूबर
कृष्ण कुमार छाबड़ा
कप्तान बाबा हरभजन सिंह (30 अगस्त 1946 – 4 अक्टूबर 1968(अमर) भारतीय सेना के एक वीर सैनिक थे। जिनका जन्म गुंजरावाल पंजाब(वर्तमान पाकिस्तान)के सदराना गांव में हुआ। भारतीय सेना के जवान उन्हें “नाथुला के नायक” के रूप में याद करते हैं और उन्होने उनके सम्मान में एक मन्दिर बनाया है। यहाँ तक कि उन्हें “बाबा” की उपाधि प्राप्त है।
कैप्टन बाबा हरभजन सिंह साहब एक वीर जवान हैं जिनके बारे में माना जाता है कि वे शहीद होकर भी देश की सेवा कर रहे हैं| वे हर दिल में आज भी अमर है।
बाबा हरभजन सिंह जी एक ऐसे वीर थे जो शहीद होकर भी अपने देश के प्रति अपनी ड्यूटी निभाते रहे। जब वे तीन दिनो तक नहीं मिले तो आर्मी के लोगो ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया था। फिर चौथे दिन बाबा हरभजन सिंह उनके दोस्त के सपने में आए। और अपने शव का पता बताया जो की ढूंढने पर वही मिला। उन्हें बाबा की लाश देख अफ़सोस हुआ कि उनकी हालत पता न होते हुए भी “भगोड़ा” कहलाया गया।
सेना देती है सारी सुविधाएं

कहा जाता है कि मृत्यु के बाद भी बाबा हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी निभाते हैं और चीन की सभी गतिविधियों की जानकारी अपने साथियों को उनके सपने में आकर देते हैं. सेना का भी बाबा हरभजन के प्रति इतना विश्वास है कि, उन्हें बाकी सभी सैनिकों की तरह वेतन, दो महीने की छुट्टी आदि सभी सुविधाएं दी जाती हैं. हालांकि, अब बाबा हरभजन सिंह रिटायर हो चुके हैं.
दो महीने की छट्टी के दौरान बकायदा ट्रेन में उनके घर तक की टिकट बुक करवाई जाती है और स्थानीय लोग उनका सामान लेकर उन्हें रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाते हैं. नाथुला में जब भी भारत और चीन के बीच फ्लैग मीटिंग होती है तो चीनी सेना बाबा हरभजन के लिए अलग से एक कुर्सी भी लगाती है.
जूतों पर अक्सर मिलती है कीचड़
बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में उनकी तस्वीर के साथ उनके जूते और बाकी सामान को रखा गया है. भारतीय सेना के जवान मंदिर की चौकीदारी करते हैं और रोजाना उनके जूतों को पॉलिश भी करते हैं. वहां पर तैनात सिपाहियों ने कई बार ऐसा कहा है कि उनके जूतों पर अक्सर कीचड़ या मिट्टी लगी होती है और उनके बिस्तर पर सलवटें भी दिखाई पड़ती है. भारतीय सेना और लोगों का ऐसा मानना है कि बाबा हरभजन सिंह की आज भी यहां सूक्ष्म उपस्थिति है और वो देश की सरहद की रक्षा करते हैं.
आर्मी ने उनके लिए एक मंदिर भी बनवाया। वे उनकी तंख्वा हर महीने उनके घर भेजते है। उनको छुट्टी पर घर भी भेजा जाता है। आर्मी के दो कैंडिडेट उनका सामान छुट्टी पर उनके साथ घर भेज देते हैं। जब कभी कोई चौकिदार की बोर्डर पर पहरा देते वक्त आंख लग जाती है तो उनको हवा से चाटे भी पड़ते। मानो कोई उन्हें जगा रहा हो। आर्मी ऑफिसर्स ने उन्हें ‘बाबा’ की उपाधि दी। आर्मी आज भी उनकी याद करती हैं। वे हमेशा अमर रहेंगे।

















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